बिलासपुर जलप्रलय: रिकॉर्ड बारिश से शहर बेहाल, हाईकोर्ट की सख्ती के बावजूद जमीनी हकीकत ने खोली सिस्टम की परतें

Journalist Amardeep Chauhan
http://amarkhabar.com
बिलासपुर।
छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में मानसून ने इस बार ऐसा रौद्र रूप दिखाया है, जिसने दशकों पुराने रिकॉर्ड तोड़ दिए और प्रशासनिक दावों की वास्तविकता को बेपर्दा कर दिया। महज 24 घंटे में 415 मिमी बारिश और कुछ घंटों में ही सैकड़ों मिमी पानी गिरने से शहर बाढ़ जैसे हालात में डूब गया। सड़कें नालों में तब्दील हो गईं, कॉलोनियों में नावें चलने लगीं और सरकारी दफ्तरों से लेकर कलेक्टर बंगले तक पानी घुस आया।
इस आपदा ने न सिर्फ शहर की आधारभूत संरचना की कमजोरियों को उजागर किया, बल्कि यह भी दिखाया कि हाईकोर्ट की सख्त चेतावनियों के बावजूद जमीनी स्तर पर तैयारियां कितनी खोखली हैं।

हाईकोर्ट की सख्ती, लेकिन असर नदारद
लगातार जलभराव और बिजली संकट के मामलों पर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट पहले ही गंभीर रुख अपना चुका है। कोर्ट ने साफ कहा था कि कागजी योजनाएं नहीं, बल्कि उनका प्रभाव जमीन पर दिखना चाहिए। इसके बावजूद हालात जस के तस रहे।
कोर्ट ने ऊर्जा विभाग के प्रमुख सचिव, बिजली कंपनी के एमडी और नगर निगम आयुक्त को व्यक्तिगत निगरानी के निर्देश देते हुए 30 जुलाई तक प्रगति रिपोर्ट मांगी है। लेकिन शुक्रवार की बारिश ने साफ कर दिया कि सिस्टम अभी भी तैयारी से कोसों दूर है।

जब शहर बना टापू: कॉलोनियों में नाव, लोग छतों पर
बारिश की तीव्रता इतनी अधिक रही कि शहर के सरकंडा, चांटीडीह, दोमुहानी, मानिकपुर और देवरीखुर्द जैसे निचले इलाके पूरी तरह जलमग्न हो गए। कई घरों में पानी छत तक पहुंच गया और लोग रातभर फंसे रहे।
एसडीआरएफ की टीमों ने नावों के सहारे 40 से अधिक लोगों को सुरक्षित बाहर निकाला। कई इलाकों में घर टापू बन गए, जहां तक पहुंचना भी मुश्किल हो गया था।
बिजली गुल, पानी ठप: दोहरी मार से जनता बेहाल
बारिश के साथ ही शहर में बिजली व्यवस्था भी चरमरा गई। ट्रांसफॉर्मर पानी में डूब गए, जिससे आधे से ज्यादा शहर अंधेरे में डूब गया। बिजली बंद होने से पेयजल आपूर्ति भी बाधित हो गई, जिससे हालात और गंभीर हो गए।
बिजली विभाग ने पहले मजबूत पोल, कवर्ड केबल और नए सब-स्टेशन जैसी योजनाओं का दावा किया था, लेकिन जमीनी सच्चाई इन दावों के उलट नजर आई।
रेल और सड़क यातायात पर ब्रेक
भारी बारिश का असर परिवहन व्यवस्था पर भी पड़ा। रेलवे ट्रैक पानी में डूबने से पांच मेमू ट्रेनें रद्द करनी पड़ीं, जबकि कई ट्रेनों का रूट बदला गया।
नेशनल हाईवे-49 पर पानी बहने से कई वाहन फंस गए और लंबा जाम लग गया। लीलागर नदी का जलस्तर खतरे के निशान से ऊपर पहुंचने पर कुटीघाट पुल पर आवागमन बाधित हो गया।
रिकॉर्ड बारिश के पीछे मौसम का ‘परफेक्ट स्टॉर्म’
मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार, बंगाल की खाड़ी से आई नमी, कम दबाव का क्षेत्र, द्रोणिका और ऊपरी हवा के चक्रवात—इन तीन सिस्टम के एक साथ सक्रिय होने से बादल एक ही स्थान पर ठहर गए। परिणामस्वरूप बेहद कम समय में अत्यधिक वर्षा हुई, जिसे ‘क्लाउड बर्स्ट’ जैसी स्थिति माना जा रहा है।
जलभराव के असली कारण: सिर्फ बारिश नहीं, प्लानिंग की कमी भी
नगर निगम ने नालों की सफाई, कंट्रोल रूम और मशीनरी की उपलब्धता का दावा किया था, लेकिन विशेषज्ञों और अधिकारियों का मानना है कि समस्या सिर्फ भारी बारिश नहीं है।
मुख्य कारणों में शामिल हैं:
– शहर की पुरानी बस्तियों में सुनियोजित ड्रेनेज का अभाव
– जल निकासी क्षेत्रों में अवैध कॉलोनियों का निर्माण
– एक ही मुख्य नाले (जवाली नाला) पर अत्यधिक निर्भरता
– नए जल निकासी चैनलों का अभाव
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क्षेत्रीय असर: रायगढ़ से जांजगीर तक बाढ़ जैसे हालात
इस मौसम प्रणाली का असर केवल बिलासपुर तक सीमित नहीं रहा। जांजगीर-चांपा और सक्ती जिले में भी नदियां उफान पर हैं। कई गांवों का संपर्क टूट गया है और खेतों में पानी भरने से फसलों को भारी नुकसान हुआ है।
रायगढ़ में केलो नदी का जलस्तर खतरे के निशान के करीब पहुंच चुका है, जिससे निचले इलाकों में अलर्ट जारी किया गया है।
प्रशासन अलर्ट पर, लेकिन भरोसा डगमगाया
हालांकि प्रशासन ने लोगों से सतर्क रहने, अनावश्यक यात्रा से बचने और जलभराव वाले क्षेत्रों से दूर रहने की अपील की है, लेकिन इस आपदा ने प्रशासनिक तैयारियों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
हाईकोर्ट की अगली सुनवाई से पहले अब सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या इस बार रिपोर्ट के साथ जमीनी बदलाव भी दिखेगा, या फिर हर साल की तरह बारिश आते ही सिस्टम फिर बेनकाब होगा?
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