घरघोड़ा में ‘मौत का ट्रेलर’: रात के अंधेरे में कुचले गए सपने, एक की मौके पर मौत, दो जिंदगी से जंग में

Journalist Amardeep Chauhan
http://amarkhabar.com
रायगढ़/घरघोड़ा, 11 जुलाई।
औद्योगिक गतिविधियों के बोझ से दबे घरघोड़ा क्षेत्र में एक बार फिर तेज रफ्तार भारी वाहनों ने खून से सड़क रंग दी। शुक्रवार देर रात अमलीडीह स्थित महावीर पेट्रोल पंप के पास एक अज्ञात ट्रेलर ने ऐसी भयावह टक्कर मारी कि एक युवक की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि दो अन्य गंभीर रूप से घायल होकर जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष कर रहे हैं।
मृतक की पहचान छर्राटांगर निवासी खलेश्वर राठिया के रूप में हुई है। बताया जा रहा है कि वह अपने साथियों के साथ बाइक से जा रहा था, तभी पीछे से आ रहे तेज रफ्तार ट्रेलर ने उन्हें अपनी चपेट में ले लिया। टक्कर इतनी भीषण थी कि खलेश्वर को संभलने का मौका तक नहीं मिला।
घायल युवकों की हालत नाजुक, रायगढ़ रेफर
हादसे के तुरंत बाद स्थानीय ग्रामीणों ने मानवता का परिचय देते हुए घायलों को संभाला और पुलिस को सूचना दी। बाजपाली के दोनों घायल युवकों को पहले घरघोड़ा अस्पताल लाया गया, लेकिन स्थिति गंभीर होने के कारण उन्हें रायगढ़ मेडिकल कॉलेज रेफर करना पड़ा। चिकित्सकों के अनुसार, दोनों की हालत चिंताजनक बनी हुई है।
हादसे के बाद फरार हुआ ट्रेलर चालक
घटना के बाद ट्रेलर चालक वाहन समेत मौके से फरार हो गया। पुलिस ने मर्ग कायम कर जांच शुरू कर दी है। आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज खंगाली जा रही है ताकि ट्रेलर की पहचान कर आरोपी को जल्द पकड़ा जा सके।
बार-बार हो रहे हादसे, जिम्मेदारी तय कब?
यह घटना कोई अपवाद नहीं है। घरघोड़ा और तमनार क्षेत्र में भारी उद्योगों की वजह से सड़कों पर दिन-रात दौड़ते ट्रेलरों का दबाव लगातार बढ़ रहा है। स्थानीय लोग लंबे समय से आरोप लगाते रहे हैं कि—
– भारी वाहन तय गति सीमा का पालन नहीं करते
– रात के समय निगरानी लगभग न के बराबर रहती है
– सड़क सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम नहीं हैं
ग्रामीणों में आक्रोश, प्रशासन से कड़ी कार्रवाई की मांग
हादसे के बाद क्षेत्र में गहरा आक्रोश है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि समय रहते प्रशासन ने सख्ती नहीं दिखाई, तो ऐसे हादसे आगे भी होते रहेंगे। लोगों ने मांग की है कि—
– भारी वाहनों की गति पर सख्त नियंत्रण हो
– रात्रिकालीन पेट्रोलिंग बढ़ाई जाए
– संवेदनशील स्थानों पर स्पीड मॉनिटरिंग सिस्टम लगाया जाए
एक सवाल जो बाकी है
हर हादसे के बाद जांच, मुआवजा और आश्वासन की प्रक्रिया दोहराई जाती है, लेकिन सवाल वही रहता है—
क्या सड़कें उद्योगों के लिए हैं या इंसानों के लिए भी?
घरघोड़ा की यह घटना सिर्फ एक दुर्घटना नहीं, बल्कि सिस्टम की उस खामोशी की कहानी है, जो हर बार किसी की जान लेकर ही टूटती है।
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