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मुआवजे से वंचित 60 परिवारों की पुकार: “छूटे मकानों का सर्वे कर न्याय दिलाए प्रशासन”

Journalist Amardeep chauhan
http://amarkhabar.com

घरघोड़ा (रायगढ़)।
एसईसीएल की बरौद खुली खदान विस्तार परियोजना से प्रभावित परिवारों का असंतोष एक बार फिर सामने आया है। ग्राम बरौद के करीब 60 प्रभावित परिवारों ने कलेक्टर जनदर्शन में पहुंचकर उन मकानों के सर्वे और मुआवजे की मांग उठाई है, जो आज तक सरकारी प्रक्रिया से बाहर रह गए हैं। वर्षों से लंबित इस मुद्दे को लेकर ग्रामीणों ने प्रशासन से निष्पक्ष कार्रवाई की अपेक्षा जताई है।

प्रभावितों का कहना है कि परियोजना के लिए भूमि अधिग्रहण की अधिसूचना जारी होने के बाद अधिकांश मकानों और जमीनों का मुआवजा दिया गया, लेकिन पूरी प्रक्रिया में एक से दो वर्ष का समय लग गया। इसी दौरान परिवारों की जरूरतों को देखते हुए कई लोगों ने अपने निजी संसाधनों से छोटे-छोटे आवासीय मकान तैयार किए। उनका दावा है कि ये निर्माण किसी अतिरिक्त लाभ के उद्देश्य से नहीं, बल्कि बढ़ते परिवार के लिए आवश्यक आवास की जरूरत को पूरा करने के लिए किए गए थे।

“जरूरत के मकान, लेकिन सर्वे से बाहर”

ग्रामीणों का आरोप है कि इन नए बने मकानों का सर्वे नहीं किया गया, जिसके चलते वे आज भी मुआवजा और पुनर्वास योजना के लाभ से वंचित हैं। प्रभावित परिवारों ने बताया कि उन्होंने कई बार एसईसीएल प्रबंधन और जिला प्रशासन को व्यक्तिगत एवं सामूहिक रूप से आवेदन दिए, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।

अधूरे सर्वे पर सवाल

इस मामले में वर्ष 2021 में तहसील कार्यालय, घरघोड़ा द्वारा संयुक्त सर्वे टीम गठित करने का आदेश भी जारी किया गया था, ताकि छूटे हुए मकानों और पात्र परिवारों की पहचान हो सके। हालांकि, ग्रामीणों के अनुसार यह सर्वे कार्य बीच में ही रोक दिया गया और आज तक पूरा नहीं हो पाया। यही वजह है कि कई पात्र परिवार अब भी अपने अधिकार से वंचित हैं।

विस्थापन की कगार पर गांव

बरौद गांव अब लगभग पूर्ण विस्थापन की स्थिति में पहुंच चुका है। ऐसे में जिन परिवारों को अभी तक मुआवजा नहीं मिला है, उनके सामने आवास और पुनर्वास की गंभीर समस्या खड़ी हो गई है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि समय रहते समाधान नहीं हुआ, तो उनकी स्थिति और कठिन हो सकती है।

प्रशासन से सीधी मांग

प्रभावित परिवारों ने कलेक्टर से मांग की है कि

– छूटे हुए मकानों का पुनः निष्पक्ष सर्वे कराया जाए
– पात्र परिवारों को नियमानुसार मुआवजा दिया जाए
– पुनर्वास योजना का लाभ सुनिश्चित किया जाए

अब कानूनी विकल्प की चेतावनी

ग्रामीणों ने स्पष्ट किया है कि यदि उनकी समस्या का शीघ्र समाधान नहीं किया गया, तो वे ** में जनहित याचिका दायर करने के लिए बाध्य होंगे।


बरौद का यह मामला सिर्फ मुआवजे का नहीं, बल्कि विस्थापन के बीच न्याय और भरोसे का भी है। अब निगाहें प्रशासन की कार्रवाई पर टिकी हैं—क्या वर्षों से लंबित इस मुद्दे का समाधान होगा, या प्रभावित परिवारों को न्याय के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ेगा।

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Amar Chouhan

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