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“विकास के दावों के बीच दम तोड़ती संवेदनाएं: आखिर ‘आखिरी व्यक्ति’ तक पहुंचा क्या?”

शक्ति
झारसुगड़ा

Journalist Amardeep chauhan
http://amarkhabar.com

देश में “सबका साथ, सबका विकास” और “आखिरी व्यक्ति तक लाभ” जैसे नारों की गूंज वर्षों से सुनाई देती रही है। सरकारी मंचों से लेकर चुनावी सभाओं तक विकास की चमकदार तस्वीरें पेश की जाती हैं। लेकिन जब जमीन की हकीकत सामने आती है, तो ये दावे अक्सर खोखले प्रतीत होते हैं। हाल ही में सामने आई दो घटनाएं इस विडंबना को बेहद मार्मिक और असहज तरीके से उजागर करती हैं।

छत्तीसगढ़ के सक्ती जिले के सोंठी गांव में एक बुजुर्ग महिला के निधन के बाद ग्रामीणों को उनका शव कंधे पर उठाकर कीचड़ भरे रास्तों से लगभग एक किलोमीटर तक ले जाना पड़ा। यह सिर्फ एक अंतिम यात्रा नहीं थी, बल्कि उस व्यवस्था की ‘अर्थी’ थी, जो वर्षों से विकास के दावे करती रही है। गांव जिला मुख्यालय से महज एक किलोमीटर दूर है, फिर भी वहां तक एक पक्की सड़क नहीं पहुंच सकी। बारिश ने जैसे ही दस्तक दी, रास्ता दलदल में बदल गया और इंसान की गरिमा भी उसी कीचड़ में धंसती नजर आई।

दूसरी घटना ओडिशा के झारसुगुड़ा से सामने आई, जहां एक पति को अपनी पत्नी के शव को बाइक पर ले जाने के लिए मजबूर होना पड़ा। अस्पताल में घंटों गुहार लगाने के बावजूद शव वाहन उपलब्ध नहीं कराया गया। जिस व्यवस्था से उम्मीद थी कि वह दुख की घड़ी में सहारा बनेगी, वही व्यवस्था नदारद रही। एक आदमी अपनी जीवनसंगिनी के शव के साथ सड़क पर अकेला चल पड़ा—यह दृश्य केवल संवेदनाओं को झकझोरता नहीं, बल्कि व्यवस्था की परतें भी उधेड़ देता है।

ये दोनों घटनाएं अलग-अलग राज्यों की जरूर हैं, लेकिन इनके मूल में एक ही सवाल है—आखिर विकास हो किसका रहा है? क्या विकास सिर्फ आंकड़ों, योजनाओं और भाषणों तक सीमित रह गया है? क्या गांवों की बुनियादी जरूरतें आज भी प्राथमिकता में नहीं हैं?

सोंठी गांव के ग्रामीण वर्षों से सड़क की मांग कर रहे हैं। प्रस्ताव भेजे गए, आश्वासन मिले, लेकिन नतीजा शून्य रहा। झारसुगुड़ा में भी स्वास्थ्य व्यवस्था की सच्चाई सामने आ गई, जहां एक शव वाहन तक समय पर उपलब्ध नहीं हो सका। यह स्थिति तब है जब सरकारें स्वास्थ्य सेवाओं और ग्रामीण संपर्क मार्गों को अपनी उपलब्धियों में गिनाती हैं।

सवाल सिर्फ सुविधाओं का नहीं है, बल्कि संवेदनशीलता का भी है। जब किसी को अपने परिजन के शव को कंधे या बाइक पर ढोना पड़े, तो यह केवल सिस्टम की विफलता नहीं, बल्कि मानवीय गरिमा पर भी चोट है। ऐसी घटनाएं हमें यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि योजनाओं का वास्तविक लाभ किन तक पहुंच रहा है।

हकीकत यह है कि जिन लोगों के लिए योजनाएं बनाई जाती हैं, वे आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं। कागजों में सड़कें बन जाती हैं, रिपोर्टों में स्वास्थ्य सेवाएं बेहतर दिखती हैं, लेकिन जमीनी सच्चाई हर बारिश, हर आपदा और हर ऐसी घटना के साथ सामने आ जाती है।

प्रशासन के लिए यह आत्ममंथन का समय है। क्या केवल घोषणाएं और योजनाएं पर्याप्त हैं, या उनके क्रियान्वयन की भी जवाबदेही तय होगी? क्या उन फाइलों से बाहर निकलकर काम जमीन पर दिखेगा, जिनमें वर्षों से प्रस्ताव दबे पड़े हैं?

वहीं, यह सवाल जनता के सामने भी खड़ा होता है। आखिर कब तक लोग ऐसी परिस्थितियों को अपनी नियति मानते रहेंगे? जागरूकता, सवाल पूछने की हिम्मत और अधिकारों के प्रति सजगता ही बदलाव की पहली सीढ़ी हो सकती है।

विकास का असली अर्थ तब होगा, जब किसी गांव में अंतिम यात्रा सम्मानजनक तरीके से निकल सके, जब किसी अस्पताल से शव वाहन के लिए गुहार न लगानी पड़े, और जब “आखिरी व्यक्ति” केवल भाषणों का हिस्सा नहीं, बल्कि नीति का केंद्र बने।

जब तक यह नहीं होता, तब तक ऐसी तस्वीरें बार-बार सामने आती रहेंगी—और हर बार यह सवाल और गहरा होता जाएगा कि आखिर विकास की यह दौड़ किसके लिए है?

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Amar Chouhan

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