“संगठन से दूरी, संवेदना से नहीं”: इस्तीफा स्वीकार होने के बाद रवि भगत की भावुक प्रतिक्रिया, लंबे असंतोष का हुआ विराम

Journalist Amardeep chauhan
http://amarkhabar.com
रायगढ़।
राजनीतिक जीवन में कई फैसले अचानक दिखते जरूर हैं, लेकिन उनकी जड़ें अक्सर लंबे समय तक भीतर चल रहे द्वंद्व में होती हैं। ऐसा ही कुछ युवा आदिवासी नेता के साथ भी हुआ। भारतीय जनता पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से उनका इस्तीफा अब औपचारिक रूप से स्वीकार भी कर लिया गया है। इसके साथ ही उनके दो वर्षों से चल रहे अंतर्द्वंद्व का भी अंत हो गया।
शुक्रवार को प्रदेश संगठन की ओर से जारी सूचना में बताया गया कि भाजपा प्रदेश अध्यक्ष ने उनका त्यागपत्र स्वीकार कर लिया है। इस निर्णय के बाद रवि भगत की प्रतिक्रिया भी सामने आई, जो कहीं न कहीं उनके भीतर के भावनात्मक संघर्ष को उजागर करती है। उन्होंने कहा, “अब दल में नहीं, दिल में रहने की कोशिश करूंगा।” यह एक वाक्य उनके राजनीतिक सफर और संगठन के प्रति जुड़ाव दोनों को बयां करता है।
रवि भगत का राजनीतिक उदय उसके युवा संगठन के साथ ही हुआ। एक छोटे से गांव से निकलकर उन्होंने भारतीय जनता युवा मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष तक का सफर तय किया। यह वही मंच था, जिसने उन्हें पहचान दी, और उसी मंच से विदाई भी उन्होंने स्वयं चुनी।
सोशल मीडिया से लेकर सियासी गलियारों तक चर्चा
बुधवार को जब उनका इस्तीफा सार्वजनिक हुआ, तो देखते ही देखते वह सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। आम लोगों से लेकर राजनीतिक विश्लेषकों तक, हर कोई इस फैसले के पीछे के कारणों को समझने की कोशिश करता नजर आया। हालांकि अपने इस्तीफे में उन्होंने केवल “निजी कारणों” का उल्लेख किया, लेकिन उनके हालिया बयानों और गतिविधियों ने इस निर्णय की पृष्ठभूमि पहले ही तैयार कर दी थी।
जब अपनी ही सरकार पर उठाए सवाल
पिछले एक वर्ष में रवि भगत कई मुद्दों पर खुलकर सामने आए। सांसद निधि, डीएमएफ और सीएसआर जैसे विषयों पर उन्होंने आदिवासी समाज के हितों की बात करते हुए अपनी ही सरकार और संगठन पर कई वाजिब सवाल उठाए। यह मुखरता संगठन के भीतर असहजता का कारण बनी और अंततः उन्हें कारण बताओ नोटिस का सामना भी करना पड़ा।
पुराना नोटिस, गहराता असंतोष
26 जुलाई 2025 को प्रदेश कार्यालय की ओर से जारी नोटिस में उन पर पार्टी नेताओं के विरुद्ध दुष्प्रचार करने और अनुशासनहीनता का आरोप लगाया गया था। तत्कालीन प्रदेश पदाधिकारियों ने तीन दिनों के भीतर जवाब मांगा था। इस घटना ने उनके भीतर चल रहे असंतोष को और गहरा कर दिया।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह इस्तीफा किसी एक घटना का परिणाम नहीं, बल्कि लंबे समय से पनप रही असहमति और वैचारिक टकराव का निष्कर्ष है।
आभार और अलग राह का संकेत
अपने इस्तीफे में रवि भगत ने पार्टी के प्रति आभार भी व्यक्त किया। उन्होंने लिखा कि एक साधारण कार्यकर्ता होने के बावजूद पार्टी ने उन्हें जो पहचान और सम्मान दिया, उसके लिए वे सदैव कृतज्ञ रहेंगे। लेकिन इसके साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट कर दिया कि अब वे अपनी राह अलग चुन चुके हैं।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि रवि भगत का अगला कदम क्या होगा। फिलहाल उन्होंने किसी नई राजनीतिक दिशा का संकेत नहीं दिया है, लेकिन उनकी सक्रियता और जनसरोकारों से जुड़े मुद्दों पर उनकी पकड़ को देखते हुए यह तय माना जा रहा है कि वे सार्वजनिक जीवन से दूरी नहीं बनाएंगे।
राजनीति में ऐसे मोड़ अक्सर नए अध्याय की शुरुआत भी होते हैं। रवि भगत का यह फैसला भी आने वाले समय में छत्तीसगढ़ की राजनीति में नए समीकरणों को जन्म दे सकता है।
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