प्राकृतिक और खनिज संसाधनों का काॅरपोरेटीकरण !
Journalist Amardeep chauhan
http://amarkhabar.com
डाॅ. कृष्णस्वरूप आनन्दी
देश इस समय बड़े क्रान्तिक दौर से गुज़र रहा है । वैश्विक काॅरपोरेट-नीत बहुराष्ट्रीय उपनिवेशवाद को मुकम्मल करने की दृष्टि से हर साज़िश रची जा रही है । दुनिया-भर की लुटेरी और मुनाफ़ाख़ोर बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ इस देश के अमूल्य और दुर्लभ प्राकृतिक एवं खनिज संसाधनों को हड़पने पर आमादा हैं । भूमण्डलीकरण के दौर में एक के बाद एक करके सभी क्रमागत सरकारें उनकी और ज़्यादा वफ़ादार , आज्ञाकारी या पालतू एजेण्ट बनती गयी हैं ।
अपने व्यावसायिक अड्डे , भीमकाय उत्पादन-संयन्त्र , विनिर्माण-नाभिचक्र , प्रौद्योगिकी पार्क , हाइ-टेक् टाउनशिप , अन्तरराष्ट्रीय वित्तीय कारोबारी केन्द्र , औद्योगिक संकुल , बहु-उद्देशीय विशेष आर्थिक ज़ोन आदि स्थापित करने के लिए देशी-विदेशी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को विशाल भू-क्षेत्र चाहिए । अपने क्रियाकलापों को चतुर्दिक् द्रुत गति से निर्बाध चलाये रखने के लिए उन्हें विश्व-स्तरीय अधःसंरचना की अहर्निश सख़्त ज़रूरत है । ये सब चीज़ें आकार लेंगी , आख़िर धरती पर ही । इसीलिए काॅरपोरेट-समूहों के द्वारा ज़मीनें हड़पने के क़ानूनों को सरकारें लगातार पैना करती आयी हैं , जिससे काॅरपोरेट-नीत बहुराष्ट्रीय औपनिवेशिक तन्त्र की पकड़ देश पर मज़बूत , मुकम्मल और स्थायी बन सके । ध्यान देने की बात है कि ब्रितानी साम्राज्य के द्वारा प्रवर्तित औपनिवेशिक शासन-तन्त्र ने सन् 1894 में भू-अधिग्रहण का जो क़ानून बनाया था ; आज़ादी मिलने के बाद उसे सरकारें उत्तरोत्तर और ज़्यादा पर्यावरण , कृषिकार्य व समुदाय विरोधी तथा उद्योग , भोग व शहर समर्थक बनाती गयी हैं ।
जिन उद्योग-नगरियों या मायापुरियों के लिए ज़मीनें ली जा रही हैं , वे इस देश के जनगण के लिए कदापि नहीं हैं । मूलतः उनका उद्देश्य काॅरपोरेट-समूहों का साम्राज्य-विस्तार है । विकास , औद्योगीकरण और उन्नत जीवन-स्तर के नाम पर जो माॅडल बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ दुनिया-भर में चला रही हैं ; उसमें अधिसंख्य आबादी के लिए कोई जगह नहीं है । यह माॅडल पारिस्थितिकी , खेती-किसानी , सामुदायिकता , सामूहिकता , सहकारिता , सादगी , आजीविका और अपरिग्रह या संयम पर कुठाराघात कर रहा है ।
धरातल पर जितने भी प्राकृतिक व भौतिक सम्पदाएँ या संरचनाएँ हैं , उन सब पर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की नज़रें गड़ी हुई हैं । सारे जल-स्रोत , वन-क्षेत्र , पहाड़ी इलाक़े , खेत-खलिहान , गाँव-गिराँव आदि उनके क़ब्ज़े में आते जा रहे हैं । धरती की ऊपरी सतह पर मौजूद आकाशीय किरणों , तरंगों आदि पर भी वे क़ाबिज़ होती जा रही हैं । दिक्काल , ग्रह , नक्षत्र , अन्तरिक्ष आदि सभी उनके निशाने पर हैं । इधर भूगर्भ में मौजूद ठोस, द्रव व गैस के विविध रूप उनके अधिग्रहण या अधिकार-क्षेत्र में आते गये हैं ।
बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का हमला खानों और खनिजों पर क़ब्ज़ा जमाने के लिए तेज़ होता गया है । कोयला , बाॅक्साइट , चूना-पत्थर , लौह अयस्क , मैगनीज , ग्रैफ़ाइट , ग्रेनाइट जैसे अनगिनत बेशक़ीमती नैसर्गिक संसाधनों की लूट या डकैती के लिए वे कमर कस चुकी हैं । खदानों और खनिजों को नीलामी के ज़रिये काॅरपोरेट-समूहों के हवाले किया जा रहा है । यह बुनियादी सवाल दरकिनार कर दिया गया है कि आखि़र प्रकृति-प्रदत्त संसाधनों का सम्प्रभु स्वत्वाधिकारी कौन है ? धरती के अन्दर और बाहर मौजूद संसाधनों को सरकारों, अदालतों अथवा कम्पनियों ने नहीं पैदा किया है । ये सारे संसाधन प्रकृति की सृष्टि के अन्तर्गत आते हैं । इनको प्रकृति ने जन्म दिया है , पृथिवी इनको धारण करती है और वही इनका पालन-पोषण कर रही है । इसलिए इनका स्वामित्व प्रकृति में सन्निहित है ।
जीवन्त पर्यावरण के साथ सहजीवन करने वाला स्वयंभू स्थानिक लोकसमुदाय शुरू से ही प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण व संवर्द्धन करता चला आ रहा है । वह सारे प्राकृतिक संसाधनों को आत्मभाव के साथ सहेजता है और उसे नयी पीढ़ी को सौंपता है । उससे भी यही कामना देशज समुदाय करता है कि वह भी उनकी सार-सँभाल करती रहेगी और आगे आने वाली पीढ़ी को भावी जीवन-यात्रा के लिए उन्हें सवाया करके सिपुर्द करेगी । अगर सवाया न हो सके, तो कम से कम जस-का-तस तो रहे ही । कहने का मतलब यह है कि तृणमूल पर अवस्थित आधारभूत जन-समुदाय प्रकृति-प्रदत्त सारे संसाधनों के सिर्फ़ ट्रस्टी-भर हैं । मालिकाना हक़ तो प्रकृति अथवा धरती माता का है । जैवरूपों और प्राकृतिक संसाधनों , स्रोतों या संरचनाओं पर सरकारी या काॅरपोरेटी स्वामित्व , नियोजन या नियन्त्रण हर दृष्टि से अनर्थकारी है ।
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