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“भू-अर्जन से पहले ‘शेड पॉलिटिक्स’ का खेल? अवैध निर्माणों पर प्रशासन सख्त, स्थानीय नेताओं की भूमिका पर उठे सवाल”

Journalist Amardeep chauhan
http://amarkhabar.com

रायगढ़।
कोयला खनन परियोजनाओं से पहले होने वाले भू-अर्जन की प्रक्रिया अक्सर संवेदनशील मानी जाती है, लेकिन धरमजयगढ़ क्षेत्र में इन दिनों जो तस्वीर उभर रही है, उसने प्रशासन और स्थानीय राजनीति—दोनों को कठघरे में खड़ा कर दिया है। खेतों में तेजी से खड़े किए जा रहे अस्थायी शेड अब केवल निर्माण नहीं, बल्कि संभावित मुआवजा बढ़ाने की रणनीति के रूप में देखे जा रहे हैं।

कलेक्टर के निर्देश पर शनिवार को शाहपुर और आसपास के प्रभावित क्षेत्रों में प्रशासनिक टीम ने निरीक्षण किया। तहसीलदार हितेश साहू के नेतृत्व में हुए इस दौरे में कई खेतों पर हाल ही में बनाए गए शेड चिन्हित किए गए। प्रारंभिक जांच में यह भी सामने आया है कि इनमें कुछ निर्माण स्थानीय राजनीतिक कार्यकर्ताओं और बीजेपी नेताओं से जुड़े बताए जा रहे हैं। मिली जानकारी के मुताबिक बीजेपी किसान मोर्चा प्रदेश उपाध्यक्ष, गोविंद साव (ग्राम पटेल), प्रवीण मिंज, चंद्रशेखर पटेल, गजानंद पटेल (उप सरपंच शाहपुर), बबलू पटेल, नीलमणि पटेल, शशि पटेल (बीजेपी नेता) के खेतों में शेड मिले हैं। हालांकि, प्रशासन की ओर से आधिकारिक रूप से किसी पर आरोप तय नहीं किया गया है और मामले की जांच जारी है।

तेजी से बदलता भू-दृश्य, बढ़ती आशंकाएं
जानकारी के अनुसार, दक्षिण पूर्वी कोलफील्ड्स लिमिटेड () द्वारा प्रस्तावित दुर्गापुर माइंस परियोजना के लिए बड़े पैमाने पर भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया चल रही है। वर्ष 2015 में अधिसूचना जारी होने के बाद अब करीब 1677 हेक्टेयर भूमि के अधिग्रहण की कार्रवाई आगे बढ़ रही है, जिसमें राजस्व और वन भूमि दोनों शामिल हैं।

इसी बीच, प्रभावित गांवों—दुर्गापुर, शाहपुर, तराईमार, बायसी और धरमजयगढ़ कॉलोनी—में रातों-रात शेड निर्माण की गतिविधियां तेज हो गई हैं। स्थानीय स्तर पर यह चर्चा है कि ये निर्माण संभावित मुआवजा दावों को मजबूत करने के उद्देश्य से किए जा रहे हैं। हालांकि, इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हो पाई है।

ड्रोन सर्वे में व्यवधान, प्रशासन की चिंता बढ़ी
सूत्र बताते हैं कि परियोजना क्षेत्र का ड्रोन सर्वे शुरू होते ही कुछ समूहों ने इसका विरोध किया और सर्वे कार्य में व्यवधान डाला। प्रशासन इसे गंभीरता से ले रहा है, क्योंकि सर्वेक्षण के बिना वास्तविक स्थिति का आकलन और निष्पक्ष मुआवजा निर्धारण कठिन हो जाता है।

इससे पहले एसडीएम कार्यालय की ओर से आम सूचना जारी कर अवैध निर्माण से बचने की चेतावनी दी गई थी। बावजूद इसके, निर्माण गतिविधियां जारी रहीं। निरीक्षण के बाद अब ऐसे मामलों को विधिवत दर्ज कर भू-अर्जन अधिकारी को भेजा जा रहा है।

राजनीतिक पृष्ठभूमि और बढ़ती संवेदनशीलता
धरमजयगढ़ क्षेत्र में यह पहला मामला नहीं है। इससे पहले रायगढ़, तमनार और घरघोड़ा इलाकों में भी भू-अर्जन के दौरान ऐसे विवाद सामने आ चुके हैं, जहां मुआवजा प्रक्रिया को लेकर आरोप-प्रत्यारोप लगे थे। यही वजह है कि इस बार प्रशासन अपेक्षाकृत सतर्क नजर आ रहा है।

स्थानीय स्तर पर कुछ नामों की चर्चा जरूर है, लेकिन जिम्मेदार अधिकारी फिलहाल किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से बच रहे हैं। उनका कहना है कि सभी तथ्यों की जांच के बाद ही स्थिति स्पष्ट होगी।

सिस्टम की चुनौती: नियम बनाम व्यवहार
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते अवैध निर्माणों पर प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई, तो यह प्रवृत्ति एक स्थापित पैटर्न का रूप ले सकती है। भू-अर्जन जैसी प्रक्रियाओं में पारदर्शिता बनाए रखना प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती है, वहीं स्थानीय स्तर पर जागरूकता और नियमों के पालन की जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।

फिलहाल प्रशासन की नजरें चिन्हित किए गए निर्माणों पर हैं और आगे की कार्रवाई रिपोर्ट के आधार पर तय होगी। लेकिन बड़ा सवाल अब भी कायम है—क्या इस बार व्यवस्था समय रहते हस्तक्षेप कर पाएगी, या फिर यह मामला भी बीते विवादों की तरह लंबी फाइलों में सिमट जाएगा?

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Amar Chouhan

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