समान वेतनमान पर हाईकोर्ट सख्त: शिक्षाकर्मियों की अपील खारिज, पंचायत व शिक्षा संवर्ग में अंतर माना निर्णायक आधार

Freelance editor Amardeep chauhan @ http://amarkhabar.com
बिलासपुर।
समान वेतनमान की मांग को लेकर लंबे समय से न्यायिक लड़ाई लड़ रहे शिक्षाकर्मियों को हाईकोर्ट से बड़ा झटका लगा है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि पंचायत संवर्ग के अंतर्गत नियुक्त शिक्षाकर्मी और स्कूल शिक्षा विभाग के नियमित शिक्षक दो अलग-अलग श्रेणियां हैं, लिहाजा दोनों को एक समान वेतन और सुविधाएं देने का दावा न्यायसंगत नहीं ठहराया जा सकता।
मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं ने राज्य शासन के 10 मार्च 2017 के उस परिपत्र का हवाला दिया, जिसमें 10 और 20 वर्ष की सेवा पूर्ण करने पर प्रमोशनल वेतनमान का प्रावधान बताया गया था। शिक्षाकर्मियों का तर्क था कि वे भी लंबे समय से शिक्षा कार्य में संलग्न हैं और उन्हें भी नियमित शिक्षकों के समान लाभ मिलना चाहिए।
हालांकि, कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। न्यायालय ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि संबंधित शासन परिपत्र केवल नियमित सरकारी शिक्षकों के लिए लागू है, पंचायत संवर्ग के कर्मचारियों पर इसका विस्तार स्वतः नहीं किया जा सकता।
अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि पंचायत विभाग के अंतर्गत दी गई सेवा को स्कूल शिक्षा विभाग की नियमित सेवा के समकक्ष नहीं माना जा सकता। दोनों की नियुक्ति प्रक्रिया, सेवा शर्तें और प्रशासनिक ढांचा अलग-अलग हैं, जो इस मामले में निर्णायक तत्व साबित हुए।
“समान काम-समान वेतन” की दलील भी खारिज
शिक्षाकर्मियों की ओर से ‘समान काम-समान वेतन’ के सिद्धांत का भी हवाला दिया गया, लेकिन अदालत ने इस तर्क को भी खारिज कर दिया। कोर्ट का मानना था कि केवल कार्य की प्रकृति समान होने से वेतन समानता का दावा स्वतः स्थापित नहीं होता, जब तक कि सेवा शर्तें और नियुक्ति की प्रक्रिया भी समान न हो।
लंबे समय से जारी है विवाद
प्रदेश में शिक्षाकर्मियों और नियमित शिक्षकों के बीच वेतन और सुविधाओं को लेकर विवाद कोई नया नहीं है। वर्षों से यह मुद्दा प्रशासनिक और राजनीतिक स्तर पर चर्चा का विषय रहा है, और कई बार आंदोलन व ज्ञापन के जरिए भी इसे उठाया गया है।
ताजा फैसले के बाद अब यह साफ हो गया है कि न्यायिक स्तर पर इस मांग को फिलहाल राहत नहीं मिली है। ऐसे में आगे की रणनीति को लेकर शिक्षाकर्मी संगठनों की निगाहें अब शासन के रुख पर टिकी रहेंगी।
संकेत स्पष्ट, राह कठिन
हाईकोर्ट के इस निर्णय ने यह संकेत दे दिया है कि संवर्गों के बीच की संरचनात्मक भिन्नता को नजरअंदाज कर समान वेतनमान की मांग को स्वीकार कराना आसान नहीं होगा। आने वाले समय में यह मुद्दा फिर से नीति निर्माण के स्तर पर ही समाधान की दिशा तलाशेगा या नहीं, यह देखना बाकी है।
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