“टीपाखोल डैम बना मौत का गवाह: तमनार से निकला किशोर लौटा नहीं, गहराई में समा गई ज़िंदगी”

Freelance editor Amardeep chauhan @ http://amarkhabar.com
रायगढ़। एक साधारण-सी सुबह, जो रोज़ की तरह शुरू हुई थी, तमनार के एक परिवार के लिए हमेशा के लिए दर्दनाक याद बन गई। 17 वर्षीय सार्थक वैष्णव का यूं अचानक लापता होना और फिर टीपाखोल डैम के ठंडे पानी से उसका निर्जीव शरीर मिलना, पूरे इलाके को स्तब्ध कर गया है।
शनिवार सुबह सार्थक अपनी बाइक लेकर घर से निकला था। परिजनों को अंदेशा भी नहीं था कि यह उसका आखिरी सफर साबित होगा। दिन ढलता गया, रात गहराती गई, लेकिन सार्थक का कोई पता नहीं चला। चिंतित परिजनों ने तमनार थाने में गुमशुदगी दर्ज कराई। हर गुजरते घंटे के साथ आशंका गहराती जा रही थी।
रविवार सुबह जैसे ही टीपाखोल डैम के किनारे उसकी लावारिस बाइक और चप्पलें मिलीं, माहौल अचानक बदल गया। अब आशंका हकीकत का रूप लेने लगी थी। सूचना मिलते ही कोतरा रोड पुलिस मौके पर पहुंची और बिना देर किए जिला आपदा मोचन बल (DDRF) को बुलाया गया।
डैम की गहराई में उतरते गोताखोरों ने सांसें थाम देने वाले उस अभियान की शुरुआत की, जिसमें हर पल उम्मीद और भय साथ-साथ चल रहे थे। करीब आधे घंटे की मशक्कत के बाद जब पानी से सार्थक का शव बाहर निकाला गया, तो वहां मौजूद हर शख्स की आंखें नम हो गईं। एक युवा जिंदगी, जो अभी शुरू ही हुई थी, अचानक थम गई।
प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, सार्थक की बाइक शनिवार दोपहर से ही डैम के किनारे खड़ी देखी गई थी। आशंका जताई जा रही है कि वह नहाने या हाथ-पांव धोने के दौरान अनजाने में गहरे पानी में चला गया और बाहर नहीं निकल सका।
सार्थक के पिता दिलीप वैष्णव, जो जिंदल पावर लिमिटेड में कार्यरत हैं, के लिए यह आघात असहनीय है। परिवार ही नहीं, पूरे क्षेत्र में भी शोक की लहर दौड़ गई है। हर कोई इस हादसे को लेकर स्तब्ध है और यही सवाल कर रहा है कि आखिर एक पल की चूक कैसे पूरी जिंदगी पर भारी पड़ गई।
पुलिस ने मर्ग कायम कर शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है। प्रारंभिक जांच में मामला दुर्घटना का प्रतीत हो रहा है, लेकिन कोतरा रोड पुलिस सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए जांच कर रही है। अंतिम स्थिति पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद ही स्पष्ट हो पाएगी।
यह घटना एक बार फिर चेतावनी देती है कि जलाशयों की गहराई और जोखिम को हल्के में लेना कितना घातक हो सकता है। जरा-सी असावधानी, अपनों को ऐसी पीड़ा दे जाती है, जिसकी भरपाई कभी संभव नहीं होती।
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