जनसुनवाई दिखावा, लगातार घुट रही लोगों की सांसें
Freelance editor Amardeep chauhan @ http://amarkhabar.com
कटंगपाली-साल्हेओना में उत्पादन बढ़ाने की तैयारी, 5 लाख टन अतिरिक्त खनन का प्रस्ताव
राजस्व बढ़ाने की दौड़ में स्वास्थ्य संकट पर प्रशासन मौन
डोलोमाइट खनन के नाम पर सारंगढ का यह इलाका अब “धीमी मौत का ज़ोन” बनता जा रहा है। सरिया, बरमकेला और चंद्रपुर के बीच चल रहे खदान और क्रशर न सिर्फ जमीन खोद रहे हैं, बल्कि लोगों की सांसें भी छीन रहे हैं। 6 और 7 अप्रैल को होने वाली जनसुनवाई को लेकर प्रशासन सक्रिय है, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह सुनवाई जनता के लिए है या सिर्फ कागजी मंजूरी के लिए?
रायगढ़ । नये जिले सारंगढ के अंतर्गत सरिया, बरमकेला और चंद्रपुर के बीच फैला डोलोमाइट क्लस्टर अब विकास का प्रतीक नहीं, बल्कि धीरे-धीरे एक “बीमार भूगोल” में बदलता जा रहा है। खदान और क्रशर की लगातार गतिविधियों ने हवा, पानी और जमीन को इस कदर प्रभावित किया है कि स्थानीय लोगों की जिंदगी धूल के साथ घुलती नजर आ रही है।
6 और 7 अप्रैल को कटंगपाली और साल्हेओना में प्रस्तावित जनसुनवाई को कागजों में पारदर्शिता का माध्यम बताया जा रहा है, लेकिन जमीनी हकीकत में यह प्रक्रिया महज औपचारिकता बनकर रह गई है। प्रस्ताव लागू होने पर हर साल करीब 5 लाख टन अतिरिक्त डोलोमाइट का खनन होगा।
स्वास्थ्य पर संकट, आंकड़ों में सन्नाटा
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि वर्षों से खनन और क्रशर संचालन के बावजूद मजदूरों और ग्रामीणों के लिए नियमित स्वास्थ्य जांच की कोई व्यवस्था नहीं है।
डोलोमाइट धूल से सांस और फेफड़ों की बीमारियां बढ़ रही हैं, लेकिन न कोई आधिकारिक डेटा है, न रोकथाम की योजना।
कंपनी विस्तार की तैयारी
7 अप्रैल 2026 को आर्यन मिनरल्स एंड मेटल्स प्रालि की जनसुनवाई प्रस्तावित है। कंपनी क्रशर की क्षमता 1 लाख टन से बढ़ाकर 2,00,198 टन सालाना करना चाहती है।
करीब 4.961 हेक्टेयर क्षेत्र में चल रही इस लीज की अवधि 2067 तक है।
राजस्व बनाम जिंदगी
सरकार के लिए यह सौदा फायदेमंद है — लाखों टन अतिरिक्त उत्पादन, करोड़ों का राजस्व। लेकिन सवाल यह है कि इस विकास की कीमत कौन चुका रहा है?
जनसुनवाई या औपचारिकता?
प्रभावित गांवों तक सही जानकारी नहीं
तकनीकी दस्तावेज आम लोगों की समझ से बाहर
विरोध की आवाजें दबने के आरोप
नतीजा— परियोजनाएं पास, और जनता धूल निगलने को मजबूर। डोलोमाइट खनन सिर्फ जमीन की खुदाई नहीं है — यह एक ऐसा खेल बन चुका है, जिसमें कंपनियां मुनाफा कमा रही हैं, प्रशासन आंकड़े गिन रहा है और जनता बीमार हो रही है।
3 बड़े सवाल
क्या राजस्व के लिए लोगों की सेहत दांव पर?
बिना स्वास्थ्य सर्वे के कैसे बढ़ेगा उत्पादन?
जनसुनवाई में असली आवाजें क्यों गायब?
कौन हैं इस खेल के खिलाड़ी?
1- निजी खनन कंपनियां
2- स्थानीय प्रशासनिक तंत्र
3- पर्यावरण स्वीकृति देने वाली एजेंसियां
👉 सबकी भूमिका अलग,
👉 लेकिन नतीजा एक — खनन जारी, सवाल बंद
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