आरक्षण की नई दिशा: SC/ST में क्रीमी लेयर लागू करने के खिलाफ केंद्र का मजबूत पक्ष
Journalist Amardeep Chauhan
http://amarkhabar.com
नई दिल्ली। अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के आरक्षण ढांचे में “क्रीमी लेयर” लागू करने को लेकर देश में एक बार फिर संवैधानिक बहस तेज हो गई है। केंद्र सरकार ने उच्चतम न्यायालय में साफ शब्दों में कहा है कि SC/ST वर्गों पर क्रीमी लेयर सिद्धांत का विस्तार न तो संवैधानिक दृष्टि से उचित है और न ही सामाजिक न्याय की मूल भावना के अनुरूप। यह रुख उस समय सामने आया है, जब सात न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने वर्ष 2024 में दिए अपने महत्वपूर्ण निर्णय में SC/ST आरक्षण के भीतर उप-वर्गीकरण की अनुमति दी थी।
ऐतिहासिक अन्याय बनाम आर्थिक पैमाना
केंद्र सरकार का तर्क स्पष्ट है—SC/ST समुदायों को दिया गया आरक्षण केवल आर्थिक पिछड़ेपन का उपचार नहीं, बल्कि सदियों से चले आ रहे जातिगत भेदभाव, अस्पृश्यता और सामाजिक बहिष्कार की भरपाई का संवैधानिक उपाय है। सरकार का मानना है कि यदि क्रीमी लेयर जैसे आर्थिक मानदंड को इन वर्गों पर लागू किया गया, तो यह उनके ऐतिहासिक उत्पीड़न के मूल कारणों को नज़रअंदाज़ करेगा।
नीतिनिर्माताओं के अनुसार, किसी व्यक्ति की आय या पद उसके सामाजिक अनुभवों को पूरी तरह समाप्त नहीं कर सकती। एक उच्च पद पर पहुंचा SC/ST अधिकारी भी समाज में व्याप्त पूर्वाग्रहों और अदृश्य भेदभाव से पूरी तरह मुक्त नहीं होता। ऐसे में केवल आय के आधार पर उसे आरक्षण से बाहर करना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता।
क्रीमी लेयर: OBC तक सीमित अवधारणा
क्रीमी लेयर की अवधारणा मूलतः अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के संदर्भ में विकसित हुई थी, जहाँ अपेक्षाकृत संपन्न और सशक्त वर्गों को आरक्षण लाभ से बाहर रखा गया। इसका उद्देश्य था कि वास्तविक रूप से वंचित तबकों तक अवसर पहुँच सकें। लेकिन SC/ST के संदर्भ में यह तर्क सीधे लागू नहीं होता, क्योंकि यहाँ पिछड़ापन केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक संरचना में गहराई से निहित है।
उप-वर्गीकरण: संतुलन का नया रास्ता
उच्चतम न्यायालय के हालिया फैसले ने SC/ST के भीतर उप-वर्गीकरण का रास्ता खोला है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि आरक्षण का लाभ केवल कुछ प्रभावशाली समूहों तक सीमित न रह जाए, बल्कि सबसे अधिक वंचित वर्गों तक पहुँचे।
केंद्र सरकार भी इसी दिशा में झुकाव दिखा रही है। उसका मानना है कि क्रीमी लेयर लागू करने के बजाय, उप-वर्गीकरण के माध्यम से आरक्षण का अधिक न्यायसंगत वितरण संभव है। इससे न तो किसी को पूरी तरह बाहर किया जाएगा और न ही संवैधानिक ढांचे से छेड़छाड़ होगी।
संवैधानिक दायरे और न्यायपालिका-कार्यपालिका संतुलन
सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि SC/ST सूची में किसी प्रकार का बदलाव केवल संसद के अधिकार क्षेत्र में आता है। न्यायालय द्वारा क्रीमी लेयर लागू करना अप्रत्यक्ष रूप से इन सूचियों में हस्तक्षेप जैसा होगा, जो शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत के विपरीत है।
हालांकि न्यायपालिका ने पूर्व में यह संकेत दिया है कि क्रीमी लेयर लागू करने से सूची में बदलाव नहीं होता, फिर भी इस मुद्दे पर संवैधानिक व्याख्या को लेकर मतभेद कायम हैं।
आँकड़ों की कमी भी बड़ी चुनौती
एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि देश में अभी तक व्यापक और अद्यतन सामाजिक-आर्थिक जाति आधारित आँकड़े उपलब्ध नहीं हैं। ऐसे में यह तय करना कि कौन “क्रीमी लेयर” में आता है, व्यावहारिक रूप से कठिन और विवादास्पद हो सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि बिना ठोस डेटा के कोई भी नीति निर्णय मनमाना साबित हो सकता है।
सामाजिक न्याय की मूल भावना पर जोर
पूरे विवाद के केंद्र में एक बड़ा सवाल है—क्या आरक्षण केवल गरीबी हटाने का साधन है या सामाजिक प्रतिनिधित्व और सम्मान सुनिश्चित करने का माध्यम? केंद्र सरकार का रुख दूसरे पक्ष की ओर झुकता दिख रहा है। उसका कहना है कि SC/ST आरक्षण का उद्देश्य समाज में बराबरी और गरिमा स्थापित करना है, जिसे केवल आर्थिक मानकों से नहीं आँका जा सकता।
बहस अभी जारी है
SC/ST में क्रीमी लेयर लागू करने को लेकर उठी यह बहस भारतीय लोकतंत्र में सामाजिक न्याय की जटिलताओं को उजागर करती है। एक ओर समान अवसर की मांग है, तो दूसरी ओर ऐतिहासिक अन्याय की भरपाई का सवाल। फिलहाल, केंद्र सरकार उप-वर्गीकरण को अधिक व्यावहारिक और संवैधानिक रूप से सुरक्षित विकल्प मान रही है।
आने वाले समय में न्यायपालिका और विधायिका के बीच इस मुद्दे पर और स्पष्टता आने की उम्मीद है, लेकिन इतना तय है कि यह बहस देश की सामाजिक संरचना और आरक्षण नीति के भविष्य को गहराई से प्रभावित करेगी।
अन्य अधिक खबरों के लिए स्क्रॉल डाउन करें 👇⬇️