NTPC लारा विस्तार की आहट: महलोई जनसुनवाई से पहले उभरी आशंकाएं, फ्लाई ऐश और जमीन अधिग्रहण पर फिर गहराया विवाद

Freelance editor Amardeep chauhan @ http://amarkhabar.com
रायगढ़, 20 मई |
औद्योगिक विस्तार की रफ्तार के बीच रायगढ़ का लारा क्षेत्र एक बार फिर विकास बनाम पर्यावरण और आजीविका के द्वंद्व के केंद्र में आ खड़ा हुआ है। NTPC के लारा परियोजना के तीसरे चरण के प्रस्तावित विस्तार को लेकर 2 जून को महलोई में आयोजित होने वाली जनसुनवाई से पहले ही इलाके में हलचल तेज हो गई है।
कंपनी की योजना के मुताबिक तीसरे चरण में लगभग 227 हेक्टेयर भूमि का अधिग्रहण किया जाना प्रस्तावित है, जिसमें अधिकांश हिस्सा निजी जमीन का बताया जा रहा है। इसके साथ ही वन भूमि भी इस दायरे में आने की चर्चा है, जिससे पर्यावरणीय प्रभाव को लेकर चिंताएं और गहरी हो गई हैं।
क्षमता बढ़ेगी, दबाव भी बढ़ेगा
वर्तमान में लारा संयंत्र की दो इकाइयों से 1600 मेगावाट बिजली उत्पादन हो रहा है, जबकि दूसरे चरण के पूरा होने के बाद यह क्षमता 3200 मेगावाट तक पहुंचने का अनुमान है। तीसरे चरण में प्रस्तावित नई इकाइयों के जुड़ने के बाद उत्पादन और अधिक बढ़ेगा—लेकिन इसके साथ ही फ्लाई ऐश (राख) का बोझ भी कई गुना बढ़ने की आशंका है।
स्थानीय स्तर पर यह चिंता प्रमुख है कि अभी जहां सालाना करीब 32 लाख टन फ्लाई ऐश निकल रहा है, वहीं विस्तार के बाद यह आंकड़ा एक करोड़ टन के पार जा सकता है। पहले से ही एश डाइक में बड़ी मात्रा में जमा राख के निष्पादन का मुद्दा अधूरा है, ऐसे में अतिरिक्त उत्पादन नई चुनौती खड़ी कर सकता है।
पुराने आरोप, नई आशंकाएं
लारा परियोजना पर पहले भी फ्लाई ऐश के प्रबंधन को लेकर सवाल उठते रहे हैं। स्थानीय लोगों और परिवहन से जुड़े वर्गों के बीच यह धारणा रही है कि अवैध डंपिंग और निगरानी में ढिलाई के मामले सामने आते रहे हैं। पर्यावरणीय एजेंसियों द्वारा की गई कार्रवाइयों का उल्लेख भी इस बहस को और तीखा बनाता है।
ऐसे में जब उत्पादन तीन गुना तक बढ़ने की संभावना जताई जा रही है, तो यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या मौजूदा व्यवस्था इस अतिरिक्त बोझ को संभाल पाएगी।
जमीन और रोजगार: सबसे बड़ा सवाल
भूमि अधिग्रहण का मुद्दा भी उतना ही संवेदनशील बना हुआ है। प्रस्तावित 227 हेक्टेयर में अधिकांश जमीन निजी स्वामित्व की बताई जा रही है। ग्रामीणों के बीच यह आशंका गहराती जा रही है कि पिछली परियोजनाओं की तरह इस बार भी मुआवजा, पुनर्वास और रोजगार के वादे अधूरे रह सकते हैं।
स्थानीय युवाओं में यह भावना भी सामने आ रही है कि स्थायी रोजगार के बजाय ठेका प्रणाली का ही विस्तार होगा, जिससे दीर्घकालिक सुरक्षा नहीं मिल पाएगी।
जनसुनवाई: औपचारिकता या निर्णायक मंच?
2 जून को महलोई में होने वाली जनसुनवाई अब इस पूरे विवाद का केंद्र बन चुकी है। कागजों पर यह प्रक्रिया आमजन की राय लेने का महत्वपूर्ण माध्यम है, लेकिन अक्सर यह आरोप भी लगते रहे हैं कि ऐसी सुनवाई महज औपचारिकता बनकर रह जाती हैं।
इस बार स्थानीय संगठनों और ग्रामीणों की नजर इस बात पर रहेगी कि उनकी आपत्तियों और सुझावों को कितनी गंभीरता से दर्ज और आगे बढ़ाया जाता है।
संतुलन की चुनौती
लारा परियोजना का विस्तार केवल एक औद्योगिक निर्णय नहीं, बल्कि एक सामाजिक-पर्यावरणीय चुनौती भी है। एक ओर ऊर्जा उत्पादन और क्षेत्रीय विकास की जरूरतें हैं, तो दूसरी ओर जमीन, पर्यावरण और स्वास्थ्य से जुड़े सवाल हैं, जिनका सीधा असर स्थानीय आबादी पर पड़ता है।
महालोई की आगामी जनसुनवाई इस पूरे घटनाक्रम का अहम पड़ाव साबित हो सकती है। यह केवल परियोजना के विस्तार की प्रक्रिया नहीं, बल्कि यह तय करने का अवसर भी है कि विकास की दिशा में आगे बढ़ते हुए स्थानीय हितों और पर्यावरणीय संतुलन को कितना महत्व दिया जाता है।
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