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“जनता की टंकी पर कॉरपोरेट की छाप: गांव में उबाल, प्रशासन सवालों के घेरे में”

Freelance editor Amardeep chauhan @ http://amarkhabar.com

खरसिया क्षेत्र के ग्राम पंचायत छोटे देवगांव में इन दिनों एक पानी टंकी ने पूरे इलाके की राजनीति और प्रशासनिक संवेदनशीलता पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। जो टंकी कभी ग्रामीणों की प्यास बुझाने और जनहित की बुनियादी सुविधा का प्रतीक थी, वही अब निजी कंपनी Adani Cement के प्रचार का माध्यम बनकर विवादों के केंद्र में आ गई है।

गांव की गलियों से लेकर चौपाल तक एक ही चर्चा है—क्या अब सार्वजनिक संपत्तियां भी कॉरपोरेट ब्रांडिंग के लिए खुला मैदान बन चुकी हैं?

“सरकारी टंकी या कंपनी का होर्डिंग?”

ग्रामीणों का आक्रोश इस बात को लेकर है कि जिस पानी टंकी का निर्माण सरकारी फंड और जनहित के उद्देश्य से हुआ, उस पर बिना किसी स्पष्ट सार्वजनिक अनुमति के कंपनी का नाम और विज्ञापन उकेर दिया गया। ग्रामीण इसे केवल प्रचार नहीं, बल्कि “सार्वजनिक संसाधनों पर निजी कब्जे की शुरुआत” मान रहे हैं।

स्थानीय निवासी कहते हैं कि यह मामला सिर्फ एक टंकी का नहीं, बल्कि व्यवस्था की प्राथमिकताओं का आईना है—जहां मूलभूत सुविधाओं की अनदेखी कर कॉरपोरेट हितों को तरजीह दी जा रही है।

अनुमति किसने दी? जवाब कौन देगा?

सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर किस विभाग या अधिकारी ने इस तरह की अनुमति दी? क्या ग्रामसभा की सहमति ली गई? क्या पंचायत को विश्वास में लिया गया?

इन सवालों का जवाब न तो पंचायत स्तर पर स्पष्ट है, न ही प्रशासनिक हलकों से कोई ठोस प्रतिक्रिया सामने आई है। यही चुप्पी ग्रामीणों के गुस्से को और भड़का रही है।

जमीनी हकीकत बनाम प्रचार की चमक

छोटे देवगांव के हालात किसी से छिपे नहीं हैं। कई मोहल्लों में सड़कें बदहाल हैं, पेयजल की नियमित व्यवस्था अब भी चुनौती बनी हुई है, और बुनियादी सुविधाएं अधूरी पड़ी हैं। ऐसे में ग्रामीणों को यह बात चुभ रही है कि जिन समस्याओं पर प्रशासन को ध्यान देना चाहिए, वहां खामोशी है—लेकिन कंपनी के प्रचार के लिए सार्वजनिक ढांचे का इस्तेमाल आसानी से हो रहा है।

एक बुजुर्ग ग्रामीण की टिप्पणी इस पूरे मामले का सार बता देती है—
“हमारे हिस्से में टूटी सड़क और अधूरा पानी आता है, और टंकी पर कंपनी का नाम चमकता है।”

जनभावनाओं की अनदेखी या सुनियोजित चूक?

ग्रामीणों का आरोप है कि बिना ग्रामसभा की जानकारी के इस तरह का कदम उठाना लोकतांत्रिक प्रक्रिया की अनदेखी है। पंचायत राज व्यवस्था में ग्रामसभा की सहमति सर्वोपरि मानी जाती है, लेकिन यहां उस पर अमल होता नहीं दिख रहा।

युवाओं का कहना है कि अगर अभी आवाज नहीं उठाई गई, तो आने वाले समय में पंचायत भवन, स्कूल और अन्य सार्वजनिक परिसंपत्तियां भी इसी तरह कॉरपोरेट ब्रांडिंग की चपेट में आ सकती हैं।

आंदोलन की चेतावनी

गांव के लोगों ने साफ चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही टंकी से कंपनी का प्रचार नहीं हटाया गया और दोषियों पर कार्रवाई नहीं हुई, तो व्यापक जनआंदोलन किया जाएगा। स्थानीय स्तर पर विरोध की रूपरेखा भी तैयार होने लगी है।

प्रशासन के सामने कसौटी

यह मामला अब केवल एक गांव तक सीमित नहीं रहा। यह प्रशासन की निष्पक्षता, पारदर्शिता और जनहित के प्रति प्रतिबद्धता की परीक्षा बन चुका है।

सवाल सीधा है—
क्या सार्वजनिक संपत्तियां जनता की रहेंगी, या उन पर धीरे-धीरे कॉरपोरेट का वर्चस्व स्थापित होगा?

छोटे देवगांव की यह टंकी अब पानी से ज्यादा व्यवस्था की सच्चाई को उजागर कर रही है।

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Amar Chouhan

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