रायगढ़ में 204 करोड़ की बिजली ड्यूटी बकाया: 16 उद्योगों पर कार्रवाई ठंडी, सबसे आगे TRN Energy और रायगढ़ इस्पात

Journalist Amardeep chauhan
http://amarkhabar.com
रायगढ़, 21 जून।
जिले में औद्योगिक विकास की चमक के बीच एक चौंकाने वाली हकीकत सामने आई है। जहां आम उपभोक्ता कुछ महीनों का बिजली बिल बकाया रहने पर कनेक्शन कटने की आशंका से घिरा रहता है, वहीं रायगढ़ के 16 बड़े उद्योग वर्षों से विद्युत शुल्क (इलेक्ट्रिसिटी ड्यूटी) का भुगतान नहीं कर रहे हैं। ब्याज सहित यह बकाया अब बढ़कर 204 करोड़ रुपये के पार पहुंच चुका है, लेकिन वसूली की कार्रवाई अब तक कागजों में ही सीमित नजर आ रही है।
कैप्टिव पावर प्लांट बने बकायादारों का केंद्र
जानकारी के अनुसार, बकाया रखने वाले 16 उद्योगों में से 15 कैप्टिव पावर प्लांट हैं, जो स्वयं की खपत के लिए बिजली उत्पादन करते हैं। नियमों के मुताबिक ऐसे प्लांटों को अधिक दर से विद्युत शुल्क देना होता है। इसके विपरीत, जो कंपनियां बिजली उत्पादन कर राज्य को आपूर्ति करती हैं, उन्हें अपेक्षाकृत कम शुल्क देना पड़ता है।
मुख्य विद्युत निरीक्षक कार्यालय, रायपुर द्वारा समय-समय पर इन उद्योगों को नोटिस जारी कर बकाया जमा करने के निर्देश दिए गए, लेकिन अधिकांश इकाइयों ने इसे नजरअंदाज किया। हर वर्ष बढ़ती देनदारी और उस पर लगने वाले ब्याज ने राशि को कई गुना बढ़ा दिया है।
इन कंपनियों पर सबसे ज्यादा बकाया
जिले के औद्योगिक परिदृश्य में कुछ कंपनियां ऐसी हैं, जिन पर बकाया राशि सबसे अधिक है—
– TRN Energy — 101.95 करोड़ रुपये
– रायगढ़ इस्पात — 62.46 करोड़ रुपये
– सिंघल स्टील एंड पावर — 24.33 करोड़ रुपये
– रुक्मणी बायोमास — 13 करोड़ रुपये
– मां काली एलॉयज — 9.48 करोड़ रुपये
– सुनील इस्पात — 9.37 करोड़ रुपये
– रुपाणाधाम स्टील — 8.47 करोड़ रुपये
– सिंघल इंटरप्राइजेस — 5.80 करोड़ रुपये
इसके अलावा मध्यम और छोटे स्तर पर भी कई इकाइयों पर बकाया है—
– स्काई एलॉयज — 3.51 करोड़ रुपये
– श्याम इस्पात — 1.78 करोड़ रुपये
– मां मंगला इस्पात — 1.39 करोड़ रुपये
– शाकम्भरी इस्पात — 92.47 लाख रुपये
– सन स्टील कंपनी — 55.57 लाख रुपये
उद्योग विभाग की भूमिका पर सवाल
एमओयू के तहत उद्योग स्थापित करने से पहले कंपनियों को जिन शर्तों का पालन करना होता है, उनमें विद्युत शुल्क का भुगतान भी शामिल है। इसके बावजूद वर्षों से लंबित बकाया इस बात की ओर इशारा करता है कि निगरानी और वसूली की प्रक्रिया में गंभीर खामियां हैं। मुख्य विद्युत निरीक्षक द्वारा बार-बार पत्राचार के बावजूद उद्योग विभाग की ओर से अपेक्षित कार्रवाई नहीं हो पाई है।
यह भी उल्लेखनीय है कि यह राशि राज्य शासन के राजस्व का हिस्सा होती है, न कि सीधे बिजली कंपनी को मिलने वाली रकम। ऐसे में 200 करोड़ से अधिक का बकाया न केवल प्रशासनिक ढिलाई को उजागर करता है, बल्कि राजस्व पर भी प्रतिकूल प्रभाव डाल रहा है।
प्रश्नों के घेरे में जवाबदेही
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते सख्त कार्रवाई नहीं की गई, तो यह बकाया और बढ़ सकता है। सवाल यह भी उठ रहा है कि जब आम उपभोक्ताओं के खिलाफ त्वरित कार्रवाई होती है, तो बड़े उद्योगों के मामले में यह नरमी क्यों?
फिलहाल यह मुद्दा प्रशासनिक पारदर्शिता, जवाबदेही और औद्योगिक अनुशासन—तीनों पर एक साथ सवाल खड़े कर रहा है। अब देखना होगा कि संबंधित विभाग इस दिशा में क्या ठोस कदम उठाते हैं।
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