रायगढ़ में ‘संवाद से समता’ की पहल: विकास बनाम पर्यावरण पर तीखी बहस, हर्ष मंदर के जन संवाद में उठे जनस्वास्थ्य और अधिकारों के सवाल

Journalist Amardeep Chauhan
http://amarkhabar.com
रायगढ़।
तेजी से औद्योगिक विस्तार के बीच पर्यावरण, जनस्वास्थ्य और नागरिक अधिकारों को लेकर उठती चिंताओं ने अब सार्वजनिक विमर्श का रूप ले लिया है। इसी कड़ी में शहर में आयोजित “संवाद से समता” जन परिचर्चा ने विकास की दिशा और उसके सामाजिक प्रभावों पर गंभीर सवाल खड़े किए। पूर्व नौकरशाह और सामाजिक चिंतक हर्ष मंदर की उपस्थिति में आयोजित इस संवाद में स्थानीय मुद्दों से लेकर राष्ट्रीय परिदृश्य तक, कई संवेदनशील विषयों पर खुलकर चर्चा हुई।

कार्यक्रम में शहर के बुद्धिजीवी, सामाजिक कार्यकर्ता, शिक्षाविद, पत्रकार और विभिन्न वर्गों के नागरिक बड़ी संख्या में शामिल हुए। प्रतिभागियों ने एक स्वर में कहा कि रायगढ़ में औद्योगिकीकरण की रफ्तार तो तेज है, लेकिन इसके साथ संतुलित योजना और पर्यावरणीय जवाबदेही का अभाव स्पष्ट दिखता है। चर्चा में यह बात बार-बार उभरी कि विकास जरूरी है, परंतु यह आम लोगों के स्वास्थ्य, आजीविका और पर्यावरणीय सुरक्षा की कीमत पर नहीं होना चाहिए।

औद्योगिक विस्तार और प्रदूषण: बढ़ती चिंता
परिचर्चा में औद्योगिक प्रदूषण को लेकर सबसे अधिक चिंता व्यक्त की गई। वक्ताओं ने कहा कि शहर और आसपास के क्षेत्रों में हवा की गुणवत्ता लगातार बिगड़ रही है, धूल और धुएं का असर जनजीवन पर साफ नजर आता है। इसे केवल पर्यावरणीय समस्या नहीं, बल्कि जनस्वास्थ्य का गंभीर मुद्दा बताते हुए विशेषज्ञों ने कहा कि दीर्घकालिक प्रभावों पर ठोस अध्ययन और पारदर्शी आंकड़ों की आवश्यकता है।
कुछ वक्ताओं ने कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों के बढ़ते मामलों का हवाला देते हुए पर्यावरणीय कारणों की वैज्ञानिक जांच की मांग भी उठाई। हालांकि, इस संबंध में ठोस निष्कर्षों के लिए विस्तृत शोध और प्रमाणिक आंकड़ों की जरूरत पर भी जोर दिया गया।

विकास मॉडल पर सवाल, भागीदारी की मांग
परिचर्चा में रायगढ़ के मौजूदा विकास मॉडल की दिशा पर भी सवाल उठाए गए। तेजी से बढ़ती आबादी, यातायात का दबाव, बुनियादी सुविधाओं की कमी और पर्यावरणीय असंतुलन को लेकर प्रतिभागियों ने चिंता जताई। वक्ताओं ने कहा कि विकास योजनाओं के निर्माण में स्थानीय समुदाय की भागीदारी सुनिश्चित करना जरूरी है, ताकि निर्णय प्रक्रिया अधिक समावेशी और उत्तरदायी बन सके।
औद्योगिक घरानों की जिम्मेदारी, प्रदूषण नियंत्रण के नियमों के पालन और प्रशासनिक निगरानी को लेकर भी कई सवाल सामने आए। कुछ प्रतिभागियों ने हाल में कुछ क्षेत्रों को प्रतिबंधित घोषित किए जाने के फैसले पर भी असहमति जताते हुए पारदर्शिता की मांग की।

सामाजिक न्याय और लोकतांत्रिक मूल्यों पर विमर्श
कार्यक्रम केवल स्थानीय मुद्दों तक सीमित नहीं रहा। देश में मौजूदा सामाजिक और लोकतांत्रिक परिस्थितियों, नागरिक अधिकारों और समानता के प्रश्नों पर भी चर्चा हुई। वक्ताओं ने कहा कि समाज में संवाद की संस्कृति को मजबूत किए बिना न्यायपूर्ण और समतामूलक व्यवस्था की कल्पना अधूरी रहेगी।
हर्ष मंदर ने प्रतिभागियों के विचारों को ध्यानपूर्वक सुना और संवाद के जरिए मुद्दों को समझने पर जोर दिया। कार्यक्रम का स्वर एकतरफा भाषण के बजाय खुली चर्चा और विचार-विमर्श पर केंद्रित रहा, जहां विभिन्न दृष्टिकोणों को जगह दी गई।

विविध वर्गों की भागीदारी
परिचर्चा में शिक्षाविद रामचंद्र शर्मा, डॉ. राजू अग्रवाल, विश्लेषक मनीष सिंह, शिक्षाविद अबरार हुसैन, वरिष्ठ पत्रकार विनय पांडेय, कामरेड युवराज सिंह आजाद, गणेश कच्छवाहा, वासुदेव शर्मा, अनिल अग्रवाल ‘चीकू’, आदिवासी नेता हृदयराम राठिया और सामाजिक कार्यकर्ता सविता रथ सहित अनेक लोगों ने अपने विचार रखे।
कार्यक्रम का संचालन जन चेतना के राजेश त्रिपाठी ने किया।
परिचर्चा में यह बात प्रमुखता से सामने आई कि विकास तभी सार्थक है, जब उसके केंद्र में आम नागरिक का अधिकार, स्वास्थ्य और सम्मान हो। रायगढ़ जैसे औद्योगिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र में विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन स्थापित करने के लिए सतत संवाद, पारदर्शिता और जनभागीदारी को मजबूती देने की आवश्यकता बताई गई।
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