“फाइलों में संवेदना, ज़मीन पर मौत: रायगढ़ के जंगलों में ‘साइलेंट किलिंग’ और पटरियों पर बिछता हाथियों का भविष्य”

Journalist Amardeep chauhan
http://amarkhabar.com
रायगढ़, 16 जून 2026।
कागज़ों पर संवेदनशील और ज़मीन पर बेपरवाह—रायगढ़ का वन प्रबंधन इन दिनों इसी विरोधाभास का जीवंत उदाहरण बनकर सामने आया है। एक ओर वातानुकूलित सभागारों में ‘मानव-हाथी सह-अस्तित्व’ पर चिंतन, ड्रोन निगरानी और आधुनिक तकनीकों के दावे हैं, वहीं दूसरी ओर जंगलों और रेलवे पटरियों पर हाथियों की लगातार हो रही मौतें उन दावों की हकीकत उजागर कर रही हैं।
पिछले छह महीनों के आंकड़े किसी सामान्य वन्यजीव संकट की कहानी नहीं, बल्कि एक गंभीर पारिस्थितिक चेतावनी हैं। जनवरी से जून 2026 के बीच रायगढ़ वन मंडल में 10 हाथियों की मौत हो चुकी है, जिनमें 9 शावक शामिल हैं। यह महज आंकड़ा नहीं, बल्कि एक पूरी पीढ़ी के समाप्त होने का संकेत है—एक ऐसा संकेत जिसे नजरअंदाज करना भविष्य के लिए खतरनाक साबित हो सकता है।
बीमार जंगल, बीमार जीवन
वन विभाग जहां इन मौतों को प्राकृतिक कारणों—दलदल, संक्रमण या कमजोरी—से जोड़कर देख रहा है, वहीं विशेषज्ञों की रिपोर्ट एक अलग ही तस्वीर पेश करती है। कई मामलों में निमोनिया, हेपेटाइटिस और सेप्टिसीमिया जैसे संक्रमण सामने आए हैं। सवाल उठता है कि जंगलों में रहने वाले स्वस्थ वन्यजीवों को ये गंभीर बीमारियां क्यों घेर रही हैं?

जवाब रायगढ़ के औद्योगिक परिदृश्य में छिपा है। कोयला खदानों, स्पंज आयरन संयंत्रों और थर्मल पावर प्लांट्स से निकलने वाली धूल और फ्लाई ऐश जंगलों की वनस्पतियों पर जम रही है। जलस्रोत रासायनिक अपशिष्ट से प्रभावित हो रहे हैं। ऐसे में जब शावक दूषित पत्तियां खाते और जहरीला पानी पीते हैं, तो उनका शरीर संक्रमणों से लड़ने में असमर्थ हो जाता है। यह एक धीमी, लेकिन व्यवस्थित ‘साइलेंट किलिंग’ है।
तकनीक का प्रदर्शन बनाम जमीनी सच्चाई
वन विभाग की कार्यशैली में सबसे बड़ा विरोधाभास तकनीक के उपयोग को लेकर सामने आता है। ड्रोन कैमरों के जरिए आम नागरिकों की गतिविधियों पर निगरानी और त्वरित कार्रवाई तो दिखती है, लेकिन यही सतर्कता हाथियों के संरक्षण में नदारद रहती है।
हाल ही में आयोजित ‘लर्निंग फ्रॉम डेड’ विषय पर राष्ट्रीय कार्यशाला इस विडंबना को और गहरा करती है। पांच सितारा होटल में आयोजित इस कार्यक्रम के कुछ ही दिनों बाद एक मादा हाथी रेलवे ट्रैक पर मालगाड़ी की चपेट में आकर तड़प-तड़प कर मर जाती है। सवाल यह नहीं कि दुर्घटना क्यों हुई—सवाल यह है कि क्या इसे रोका जा सकता था? और यदि हां, तो जिम्मेदारी किसकी है?

कॉरिडोर सिकुड़े, खतरे बढ़े
वन मंत्री द्वारा हाथियों की संख्या में वृद्धि को उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है—2022 में 240 से बढ़कर अब 450। लेकिन यह वृद्धि तब तक सार्थक नहीं जब तक उनके लिए सुरक्षित और पर्याप्त आवास उपलब्ध न हो। माइनिंग और औद्योगिक विस्तार ने हाथियों के पारंपरिक कॉरिडोर को सीमित कर दिया है। जो क्षेत्र बचे हैं, वे भी प्रदूषण और मानवीय हस्तक्षेप से प्रभावित हैं।
रेलवे ट्रैक अब इन कॉरिडोर का हिस्सा बन चुके हैं—और दुर्भाग्यवश, यही ‘डेथ जोन’ में तब्दील हो रहे हैं।
नीतियों से आगे बढ़कर ज़मीन पर कार्रवाई की जरूरत
स्थिति स्पष्ट है—समस्या बहुआयामी है और समाधान भी समन्वित होना चाहिए। वन विभाग, रेलवे और प्रदूषण नियंत्रण तंत्र के बीच प्रभावी तालमेल के बिना यह संकट और गहराएगा। केवल सेमिनार, रिपोर्ट और आंकड़ों से न तो हाथियों की जान बचेगी, न ही मानव-वन्यजीव संघर्ष कम होगा।
यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह ‘साइलेंट किलिंग’ आने वाले समय में खुले संघर्ष में बदल सकती है—जहां नुकसान सिर्फ वन्यजीवों का नहीं, बल्कि मानव बस्तियों का भी होगा।
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