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नागरामुड़ा में ‘जल, जंगल, ज़मीन’ पर फिर उठी आवाज़


Journalist Amardeep chauhan
http://amarkhabar.com

रायगढ़।
तमनार विकासखंड के नागरामुड़ा गांव में गुरुवार को एक अलग ही हलचल थी। यह हलचल सिर्फ शोर नहीं थी, बल्कि अपने अस्तित्व, अपनी जमीन और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को बचाने की एक सशक्त पुकार थी। गांव की महिलाओं ने, बच्चों और परिवार के साथ, जंगल की ओर कूच कर उस प्रस्तावित पेड़ कटाई का विरोध किया, जिसे वे अपने जीवन पर सीधा हमला मानती हैं।

अचानक शुरू हुआ जनांदोलन

बुधवार देर रात जैसे ही ग्रामीणों को जंगल में गतिविधियों की भनक लगी, गांव में तेजी से खबर फैल गई। देखते ही देखते महिलाएं, युवा और बुजुर्ग जंगल की ओर बढ़ने लगे। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, कई महिलाएं अपने छोटे बच्चों को साथ लेकर मौके पर पहुंचीं और पेड़ों की कटाई का डटकर विरोध किया।

ग्रामीणों के विरोध को देखते हुए कंपनी प्रबंधन को अपना अभियान रोकना पड़ा और उनकी टीम को वापस लौटना पड़ा। हालांकि कंपनी की ओर से यह कहा गया कि वे केवल पहले से कटे पेड़ों को हटाने पहुंचे थे, लेकिन ग्रामीणों ने इस दावे पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि यदि ऐसा ही था, तो पुलिस और प्रशासनिक उपस्थिति की क्या आवश्यकता थी।

“जंगल सिर्फ संसाधन नहीं, हमारा जीवन है”

प्रदर्शन में शामिल ग्रामीणों ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जंगल उनके लिए महज लकड़ी या जमीन नहीं है, बल्कि यह उनकी आजीविका, जलस्रोत और सांस्कृतिक पहचान का आधार है। उनका कहना है कि लगातार हो रही कटाई से न केवल पर्यावरण, बल्कि उनके जीवन का संतुलन भी बिगड़ रहा है।

कथित लालच और ग्रामीणों की एकजुटता

स्थानीय सूत्रों के अनुसार, पेड़ कटाई के कार्य को आगे बढ़ाने के लिए कुछ युवाओं को प्रलोभन दिए जाने की भी चर्चा है। नकद राशि, वाहन सुविधा और अन्य आकर्षणों के जरिए समर्थन जुटाने की कोशिश की गई। हालांकि गांव की महिलाओं और जागरूक नागरिकों ने इन प्रयासों को नकारते हुए स्पष्ट कर दिया कि वे अपने जंगलों के साथ कोई समझौता नहीं करेंगे।

विकास बनाम पर्यावरण: पुराना सवाल, नई चुनौती

तमनार क्षेत्र पिछले कुछ वर्षों में औद्योगिक विस्तार और कोयला खनन का प्रमुख केंद्र बन चुका है। इसके परिणामस्वरूप बड़े पैमाने पर वन भूमि का उपयोग बदला गया है और हजारों पेड़ काटे जा चुके हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, इसके चलते:

– जैव विविधता पर नकारात्मक असर पड़ा है
– वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास प्रभावित हुए हैं

– बारिश में भी कमी दर्ज की गई है
– भूजल स्तर में गिरावट दर्ज की गई है
– स्थानीय जलस्रोतों के सूखने की समस्या बढ़ी है
– तापमान और प्रदूषण में वृद्धि देखी जा रही है

ऐसे में नागरमुड़ा की यह घटना सिर्फ एक गांव का विरोध नहीं, बल्कि उस व्यापक संघर्ष का प्रतीक बनती जा रही है जिसमें विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन खोजने की चुनौती सामने है।

प्रशासन की भूमिका

घटना के बाद प्रशासन की भूमिका को लेकर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें पहले से कोई स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई और रात के समय की गतिविधियों ने संदेह को और गहरा किया है।

नागरमुड़ा की यह रात एक संदेश छोड़ गई है—जब बात जमीन, जल और जंगल की हो, तो सबसे मजबूत आवाज़ वही होती है जो अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए उठती है। यह संघर्ष अभी थमा नहीं है, बल्कि आने वाले दिनों में और तेज हो सकता है।

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Amar Chouhan

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