एथेनॉल प्लांट पर उठे जल संकट के सवाल: रायगढ़ में सामाजिक संगठनों ने मुख्य सचिव से हस्तक्षेप की मांग की

Journalist Amardeep chauhan
http://amarkhabar.com
रायगढ़।
जिले में प्रस्तावित एथेनॉल उद्योग को लेकर जल संसाधनों पर संभावित दबाव का मुद्दा अब सार्वजनिक बहस का विषय बनता जा रहा है। विभिन्न सामाजिक संगठनों ने इस परियोजना के पर्यावरणीय और जल संबंधी प्रभावों पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए राज्य शासन से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है।
‘रायगढ़ बचाओ–लड़ेंगे रायगढ़’, जिला बचाओ संघर्ष मोर्चा और जन चेतना संगठन के प्रतिनिधियों ने कलेक्टर के माध्यम से छत्तीसगढ़ शासन के मुख्य सचिव को ज्ञापन सौंपा है। ज्ञापन में ग्राम सरायपाली, विकासखंड घरघोड़ा में स्थापित किए जा रहे नवदुर्गा फ्यूल्स प्राइवेट लिमिटेड के एथेनॉल प्लांट की स्वीकृति प्रक्रिया की जांच कर उसे निरस्त करने की मांग की गई है।
संगठनों के प्रतिनिधि—विनय शुक्ला, वासुदेव शर्मा, राजेश त्रिपाठी, संजय देवांगन, अभिषेक चौहान, आलोक शर्मा, परेश मैती, चंद्रमणि बरेठ, आदर्श श्रीवास, शिवम कच्छवाहा, अमन तलरेजा और सूरज यादव सहित अन्य सदस्यों—ने ज्ञापन में उल्लेख किया है कि प्रस्तावित परियोजना के अनुसार प्रतिदिन 100 केएलपीडी एथेनॉल उत्पादन किया जाना है, जिसके लिए करीब 571 केएलपीडी पानी की आवश्यकता बताई गई है।
ज्ञापन में यह भी कहा गया है कि एथेनॉल उत्पादन में पानी की खपत को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर पहले से ही चिंताएं व्यक्त की जाती रही हैं। संगठनों का आरोप है कि परियोजना को स्वीकृति देते समय जल संसाधनों पर पड़ने वाले दीर्घकालिक प्रभावों का समुचित मूल्यांकन नहीं किया गया।
स्थानीय संदर्भ में चिंता और गहरी हो जाती है, क्योंकि प्रस्तावित उद्योग क्षेत्र के आसपास पहले से कई इस्पात एवं अन्य औद्योगिक इकाइयां संचालित हैं, जो केलो जलाशय और अन्य स्रोतों पर निर्भर हैं। ऐसे में जल उपलब्धता पर अतिरिक्त दबाव पड़ने और भविष्य में भूजल स्तर में गिरावट तथा पेयजल संकट की स्थिति उत्पन्न होने की आशंका जताई गई है।
ज्ञापन में यह भी उल्लेख किया गया है कि जिले में भूजल स्तर में गिरावट को लेकर समय-समय पर रिपोर्टें सामने आती रही हैं। इस पृष्ठभूमि में बड़े जल उपभोग वाले उद्योगों को अनुमति देना स्थानीय पर्यावरणीय संतुलन के लिए चुनौती बन सकता है।
संगठनों ने राज्य शासन से मांग की है कि इस पूरे प्रकरण की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच कराई जाए, साथ ही पर्यावरणीय और जल संसाधन संबंधी पहलुओं की व्यापक समीक्षा कर जनहित में उचित निर्णय लिया जाए।
हालांकि, इस मामले में परियोजना प्रबंधन या संबंधित विभागों की ओर से अब तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के मामलों में अंतिम निष्कर्ष तकनीकी अध्ययन और शासकीय जांच के बाद ही सामने आ पाता है।
इस बीच, यह मुद्दा रायगढ़ में औद्योगिक विकास और प्राकृतिक संसाधनों के संतुलन को लेकर एक महत्वपूर्ण बहस को जन्म देता नजर आ रहा है।
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