पोरा-खमरछठ की परंपरा में सियासत की दस्तक: “जोहार छत्तीसगढ़ पार्टी” के बैनर तले प्रदेश की सभी सीटों पर प्रत्याशी उतारने का ऐलान किया

http://Journalist Amardeep Chauhan
amarkhabar.com
बारिश में भी सजी छत्तीसगढ़ी संस्कृति की झांकी, अमित बघेल ने फूंका 2028 का चुनावी बिगुल
जांजगीर-चांपा।
पोरा और खमरछठ जैसे पारंपरिक तिहारों के बीच इस बार जांजगीर-चांपा जिले में संस्कृति और सियासत का अनोखा संगम देखने को मिला। छत्तीसगढ़िया क्रांति सेना के बैनर तले आयोजित कार्यक्रम ने एक ओर जहां छत्तीसगढ़ी लोकजीवन, तीज-त्योहार और परंपराओं की जीवंत झलक पेश की, वहीं दूसरी ओर मंच से राजनीतिक संदेश भी स्पष्ट तौर पर सामने आया।
सुबह से रिमझिम बारिश के बावजूद आयोजन का उत्साह कम नहीं हुआ। केरा रोड स्थित हांकी ग्राउंड से पारंपरिक गाजा-बाजा, नाचा-गीत और लोक वाद्यों के साथ झांकी निकाली गई। शहर के विभिन्न मार्गों से गुजरते हुए यह सांस्कृतिक यात्रा हाई स्कूल ग्राउंड पहुंची, जहां शाम को खमरछठ पूजा का विशेष आयोजन किया गया। बड़ी संख्या में महिलाओं ने विधि-विधान से पूजा कर अपने बच्चों की दीर्घायु और सुख-समृद्धि की कामना की।
कार्यक्रम में स्थानीय कला-संस्कृति की विविध छवियां देखने को मिलीं—लोकनृत्य, पारंपरिक वेशभूषा और छत्तीसगढ़ी गीतों की प्रस्तुति ने माहौल को पूरी तरह तिहारमय बना दिया। बारिश के बीच भी कलाकारों और प्रतिभागियों का उत्साह बना रहा, हालांकि ग्रामीण क्षेत्रों में समानांतर पूजा-पाठ और मौसम के कारण अपेक्षित भीड़ नहीं जुट सकी।
इसी मंच से छत्तीसगढ़िया क्रांति सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित बघेल ने राज्य सरकार पर तीखा प्रहार किया। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार छत्तीसगढ़ की मूल संस्कृति और यहां के महापुरुषों की उपेक्षा कर रही है। रायपुर की सब्जी मंडी का नाम स्वामी विवेकानंद के नाम पर रखे जाने का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि उनका विरोध किसी महापुरुष से नहीं, बल्कि स्थानीय अस्मिता की अनदेखी से है।
बघेल ने पर्यावरण, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे मुद्दों को भी उठाया। उन्होंने कहा कि “अब छत्तीसगढ़ के मूल निवासी अपने अधिकारों के लिए आगे आना सीख गए हैं” और जंगलों की कटाई किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
सबसे अहम घोषणा करते हुए उन्होंने वर्ष 2028 के विधानसभा चुनाव में “जोहार छत्तीसगढ़ पार्टी” के बैनर तले प्रदेश की सभी सीटों पर प्रत्याशी उतारने का ऐलान किया। इसे उन्होंने “छत्तीसगढ़िया स्वाभिमान की राजनीतिक अभिव्यक्ति” बताया।
हालांकि, आयोजन के राजनीतिक स्वरूप पर सवाल भी उठे। स्थानीय स्तर पर यह चर्चा रही कि सांस्कृतिक कार्यक्रम के जरिए संगठन अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रहा है। कम उपस्थिति को लेकर पूछे जाने पर बघेल ने कहा कि उनकी राजनीति भीड़ जुटाने की नहीं, बल्कि विचार और अधिकार की है। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि “बाहरी लोग पैसे, दारू और मुर्गा बांटकर भीड़ जुटाते हैं, हम ऐसा नहीं करते।”
कुल मिलाकर, पोरा-खमरछठ के पारंपरिक उत्सव ने इस बार जांजगीर-चांपा में सांस्कृतिक रंगों के साथ राजनीतिक संकेत भी दिए—जहां लोक परंपराओं की छांव में भविष्य की राजनीति की जमीन तैयार होती नजर आई।
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