“हनुमान चालीसा के बीच बच्चों की पुकार: ‘प्रदूषण रोको, हमें सांस लेने दो’—कैदीमुड़ा में अनोखा जनजागरण”

Journalist Amardeep Chauhan
http://amarkhabar.com
रायगढ़।
धार्मिक आस्था के मंच से जब मासूम आवाजें अपने स्वास्थ्य की चिंता जाहिर करें, तो वह केवल भावनात्मक दृश्य नहीं रहता, बल्कि समाज के लिए एक गंभीर संकेत बन जाता है। शहर के वार्ड क्रमांक 30 स्थित कैदीमुड़ा में तीसरे मंगलवार को आयोजित हनुमान चालीसा पाठ कार्यक्रम कुछ इसी वजह से चर्चा का विषय बन गया, जहां बच्चों ने पोस्टरों और प्रार्थना के जरिए प्रदूषण और सांस संबंधी बीमारियों का मुद्दा प्रमुखता से उठाया।
कार्यक्रम में सामान्यतः भक्ति और शांति का माहौल रहता है, लेकिन इस बार माहौल में एक अलग तरह की बेचैनी भी साफ झलक रही थी। छोटे-छोटे बच्चे हाथों में संदेश लिखे पोस्टर लेकर पहुंचे थे—किसी ने “प्रदूषण भगाओ” लिखा था, तो किसी ने “हमें दमा से बचाओ”। हनुमान चालीसा पाठ के बाद जब बच्चों ने एक स्वर में प्रार्थना की—“हमें सांस की बीमारी से बचाओ, फैक्ट्रियों का धुआं बंद कराओ”—तो उपस्थित लोगों के बीच कुछ क्षणों के लिए सन्नाटा छा गया।
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि यह केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि शहर की बढ़ती पर्यावरणीय समस्याओं के खिलाफ एक प्रतीकात्मक विरोध भी है। कैदीमुड़ा समेत आसपास के क्षेत्रों में बढ़ते प्रदूषण और उससे जुड़ी स्वास्थ्य समस्याओं को लेकर लोगों में चिंता लगातार बढ़ रही है, जिसका असर अब बच्चों की सोच और जीवन पर भी दिखाई देने लगा है।
कार्यक्रम में बड़ी संख्या में महिला-पुरुषों ने भागीदारी निभाई। जय यादव, राहुल श्रीवास, विनोद साहू, दुर्गेश यादव, राजेश निषाद, कौशल सिंह ठाकुर, तुषार कन्नौजिया, मोनू प्रधान, गुलशन साव, मनीष मेहर, नानू यादव, अनिल निषाद, विशाल निषाद, दिव्यांशु, जय सिंह, चंद्रशेखर और नीलकंठ साहू सहित कई स्थानीय लोग मौजूद रहे।
‘रायगढ़ बचाओ—लड़ेंगे रायगढ़’ अभियान से जुड़े विनय शुक्ला ने बताया कि शहर की विभिन्न जनसमस्याओं को लेकर हर मंगलवार अलग-अलग हनुमान मंदिरों में इस तरह के आयोजन किए जा रहे हैं। उनका कहना है कि उद्देश्य केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके माध्यम से लोगों को एक मंच पर लाकर सड़क दुर्घटनाओं, प्रदूषण, रोजगार, महंगी शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति, पेयजल संकट और सरकारी स्कूल-कॉलेजों की जर्जर हालत जैसे मुद्दों पर जागरूक करना है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि जब सामाजिक मुद्दों को धार्मिक आयोजनों के साथ जोड़ा जाता है, तो उनकी पहुंच व्यापक हो जाती है। कैदीमुड़ा में आयोजित यह कार्यक्रम भी उसी दिशा में एक प्रयास माना जा रहा है, जहां आस्था के जरिए समाज की वास्तविक समस्याओं को सामने लाने की कोशिश की गई।
हालांकि, सवाल अब भी कायम है—क्या बच्चों की यह मासूम अपील केवल प्रार्थना बनकर रह जाएगी, या प्रशासन और जिम्मेदार संस्थाएं इसे गंभीरता से लेते हुए ठोस कदम उठाएंगी? फिलहाल, कैदीमुड़ा की इस पहल ने यह जरूर साबित कर दिया है कि प्रदूषण का मुद्दा अब केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ी की सांसों से जुड़ा हुआ है।
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