गारे पेलमा ब्लॉक्स में सुस्ती से रायगढ़ के राजस्व पर संकट

कैप्टिव माइंस के बावजूद कोयला उत्पादन में कमी, अंबुजा–हिंडाल्को पर उठे सवाल; सरकार के बढ़े लक्ष्य के बीच कार्रवाई की आहट
रायगढ़, 3 सितंबर।
खनिज संपदा के लिहाज से राज्य के अग्रणी जिलों में शुमार रायगढ़ एक बार फिर उत्पादन और राजस्व के असंतुलन की चुनौती से जूझता दिख रहा है। प्रदेश सरकार ने चालू वित्तीय वर्ष के लिए खनिज राजस्व का लक्ष्य बढ़ा दिया है, लेकिन ज़मीनी स्थिति इसके उलट संकेत दे रही है। जिले में संचालित प्रमुख कैप्टिव कोल माइंस—विशेष रूप से अंबुजा सीमेंट्स और हिंडाल्को इंडस्ट्रीज—अपेक्षित उत्पादन से काफी पीछे हैं, जिससे राजस्व लक्ष्य हासिल करना मुश्किल नजर आ रहा है।
कैप्टिव माइंस, फिर भी उत्पादन में गिरावट
केंद्र सरकार की नीति के तहत कंपनियों को कैप्टिव उपयोग के लिए कोल ब्लॉक्स आवंटित किए गए थे, ताकि वे अपनी औद्योगिक जरूरतों के अनुरूप उत्पादन कर सकें। लेकिन हालात इसके विपरीत दिख रहे हैं।
सूत्रों के अनुसार, दोनों कंपनियों ने बीते वित्तीय वर्ष में निर्धारित क्षमता का महज एक चौथाई उत्पादन ही किया।
हिंडाल्को इंडस्ट्रीज को गारे पेलमा 4/4 ब्लॉक से सालाना करीब 10 लाख टन उत्पादन की अनुमति है, लेकिन वर्ष 2025-26 में उत्पादन केवल 2.3 लाख टन तक सीमित रहा।
चालू वर्ष में भी कंपनी ने करीब 3 लाख टन उत्पादन का ही अनुमान दिया है, जबकि क्षमता इससे कहीं अधिक है।
इसी तरह,
अंबुजा सीमेंट्स को गारे पेलमा 4/8 ब्लॉक से 12 लाख टन वार्षिक उत्पादन करना है, लेकिन कंपनी पिछले साल केवल 3.6 लाख टन तक ही पहुंच सकी।
वर्ष 2026-27 के लिए भी कंपनी का लक्ष्य 6 लाख टन बताया जा रहा है, जो निर्धारित क्षमता से काफी कम है।
महंगी बोली और बढ़ता प्रीमियम बना कारण
जानकारों का मानना है कि कोल ब्लॉक्स की नीलामी में कंपनियों द्वारा लगाई गई ऊंची बोलियां अब उनके लिए बोझ बनती जा रही हैं।
हिंडाल्को ने गारे पेलमा 4/4 ब्लॉक के लिए 3000 रुपए प्रति टन से अधिक की बोली लगाई थी, जबकि अंबुजा ने 4/8 ब्लॉक के लिए करीब 2291 रुपए प्रति टन का ऑफर दिया था।
साल दर साल बढ़ते प्रीमियम और उत्पादन लागत के चलते अब इन ब्लॉक्स से कोयला निकालना कंपनियों के लिए महंगा पड़ रहा है।
यही वजह है कि कंपनियां खुद उत्पादन बढ़ाने के बजाय एसईसीएल जैसे सार्वजनिक उपक्रमों से अपेक्षाकृत सस्ता कोयला खरीदकर अपने प्लांट चला रही हैं।
राजस्व लक्ष्य पर सीधा असर
पिछले वित्तीय वर्ष (2025-26) में रायगढ़ जिले को खनिज से करीब 2170 करोड़ रुपए का राजस्व प्राप्त हुआ, जो निर्धारित लक्ष्य से कम था।
इस बार सरकार ने लक्ष्य बढ़ाकर लगभग 2772 करोड़ रुपए कर दिया है। लेकिन मौजूदा उत्पादन रफ्तार को देखते हुए लक्ष्य हासिल करना चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है।
समीक्षा बैठक में उठेंगे सवाल
कोल कंट्रोलर ऑर्गनाइजेशन की आगामी समीक्षा में इन खदानों के कम उत्पादन पर गंभीर सवाल उठने तय माने जा रहे हैं। नियमों के अनुसार, आवंटित खदानों से निर्धारित मात्रा में उत्पादन करना अनिवार्य है।
यदि कंपनियां लगातार कम उत्पादन करती हैं, तो उनके खिलाफ शॉर्ट प्रोडक्शन के आधार पर कार्रवाई भी संभव है।
प्रशासन की चिंता, उद्योग पर नजर
जिला प्रशासन और खनिज विभाग के लिए यह स्थिति दोहरी चुनौती बन गई है—एक ओर राजस्व लक्ष्य का दबाव, दूसरी ओर उद्योगों की उत्पादन रणनीति।
अधिकारियों का मानना है कि यदि समय रहते उत्पादन में सुधार नहीं हुआ, तो इसका सीधा असर न केवल सरकारी आय पर पड़ेगा बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था और रोजगार पर भी दिखाई देगा।
रायगढ़ जैसे खनिज-समृद्ध जिले में उत्पादन क्षमता और वास्तविक उत्पादन के बीच बढ़ती खाई अब नीति और प्रबंधन दोनों पर सवाल खड़े कर रही है। आने वाले महीनों में यह स्पष्ट होगा कि कंपनियां उत्पादन बढ़ाने की दिशा में कदम उठाती हैं या फिर प्रशासनिक सख्ती का सामना करना पड़ता है।
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