जंगल हमारा था, जमीन हमारी थी… फिर विकास की कहानी में हम ही बेगाने क्यों हो गए?
Journalist Amardeep Chauhan
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विश्व आदिवासी दिवस पर सवाल—छत्तीसगढ़ की खनिज संपदा पर दुनिया की नजर, लेकिन उसके असली रखवालों के हिस्से में कितना सम्मान, कितना अधिकार?
रायगढ़। छत्तीसगढ़ की पहचान सिर्फ उसके विशाल खनिज भंडार, बिजली संयंत्रों, इस्पात कारखानों और तेजी से बढ़ते औद्योगिक नक्शे से नहीं है। इस धरती की असली पहचान उन जंगलों से भी है, जिन्हें पीढ़ियों से आदिवासी समाज ने अपनी सांसों की तरह संभाला है; उन पहाड़ों से है, जिन्हें उसने देवता माना; उन नदियों से है, जिन्हें उसने जीवन माना और उस मिट्टी से है, जिसे उसने सिर्फ जमीन नहीं, अपनी मां समझा।
लेकिन आज विश्व आदिवासी दिवस पर सबसे बड़ा सवाल यही है— जिस समाज ने छत्तीसगढ़ के जंगल बचाए, क्या विकास की दौड़ में उसके अधिकार भी बच पाए हैं?
रायगढ़ से लेकर सरगुजा, बस्तर से लेकर कोरबा और जशपुर तक आदिवासी समाज ने विकास की कीमत अलग-अलग रूपों में चुकाई है। कहीं खनन आया, कहीं उद्योग, कहीं बांध, कहीं सड़क और कहीं किसी परियोजना के नाम पर जमीन। विकास हुआ, अर्थव्यवस्था बढ़ी, उत्पादन बढ़ा, लेकिन कई जगहों पर सवाल वहीं खड़ा रह गया—स्थानीय समाज के हिस्से में आया क्या?
यह सवाल उद्योग विरोध का नहीं है। यह सवाल विकास की दिशा और उसकी न्यायप्रियता का है। विकास चाहिए, लेकिन अस्तित्व की कीमत पर नहीं। आदिवासी समाज आधुनिकता से भागना नहीं चाहता। वह शिक्षा चाहता है, बेहतर स्वास्थ्य चाहता है, रोजगार चाहता है, सड़क चाहता है, इंटरनेट चाहता है और अपने बच्चों का उज्ज्वल भविष्य चाहता है। लेकिन वह यह भी चाहता है कि विकास उसके घर की चौखट तोड़कर नहीं, उसके साथ संवाद करके आए।
यदि किसी क्षेत्र की जमीन पर परियोजना बनती है तो वहां के लोगों को केवल मुआवजे की रकम थमा देना पर्याप्त नहीं। उनके पुनर्वास, रोजगार, आजीविका, सामाजिक ताने-बाने और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य का हिसाब भी होना चाहिए। क्योंकि जमीन केवल जमीन नहीं होती। जमीन के साथ स्मृतियां जुड़ी होती हैं। जमीन के साथ संस्कृति जुड़ी होती है।
जमीन के साथ देवस्थल, परंपराएं और पीढ़ियों का इतिहास जुड़ा होता है।
इसीलिए आदिवासी समाज की जमीन का सवाल केवल राजस्व रिकॉर्ड का सवाल नहीं, बल्कि अस्तित्व का सवाल है।
रायगढ़ का औद्योगिक विकास और आदिवासी समाज
रायगढ़ ने औद्योगिक विकास की बड़ी छलांग लगाई है। देश के औद्योगिक नक्शे पर जिले की पहचान मजबूत हुई। लेकिन इस चमक के पीछे गांवों, जंगलों और आदिवासी अंचलों की अपनी कहानी भी है। खनन और उद्योग के विस्तार के साथ पर्यावरण, जलस्रोत, खेती, प्रदूषण, रोजगार और विस्थापन जैसे सवाल लगातार बहस का विषय रहे हैं। यहां जरूरत किसी उद्योग को खलनायक बनाने की नहीं, बल्कि एक ऐसी व्यवस्था बनाने की है जिसमें उद्योग भी चले, रोजगार भी मिले, सरकार को राजस्व भी मिले और स्थानीय समुदाय का भविष्य भी सुरक्षित रहे। आखिर विकास का अर्थ यह कैसे हो सकता है कि एक तरफ उत्पादन बढ़ता जाए और दूसरी तरफ उसी क्षेत्र के लोगों को अपनी जमीन, पानी और पर्यावरण को लेकर चिंता करनी पड़े?
आदिवासी समाज कमजोर नहीं, संघर्ष की दूसरी भाषा जानता है। आदिवासी समाज को अक्सर कमजोर, पिछड़ा या सहायता का पात्र समझने की भूल की जाती है। इतिहास इसका सबसे बड़ा खंडन है। बिरसा मुंडा का उलगुलान हो, गुंडाधुर का संघर्ष हो या देश के अलग-अलग हिस्सों में आदिवासी समाज के अधिकारों की लड़ाइयां—यह समुदाय सदियों से अन्याय के खिलाफ खड़ा होता आया है।
आज भी लोकतंत्र के हर स्तंभ में आदिवासी समाज अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहा है।
राजनीति में नेतृत्व से लेकर प्रशासन तक, शिक्षा से लेकर न्याय व्यवस्था तक, खेल से लेकर कला-साहित्य तक और गांव की ग्रामसभा से लेकर देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद तक—आदिवासी समाज ने साबित किया है कि प्रतिभा अवसर की मोहताज होती है, जाति की नहीं।
राष्ट्रपति के रूप में द्रौपदी मुर्मू का देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद तक पहुंचना इस यात्रा का ऐतिहासिक प्रतीक है। यह उन करोड़ों आदिवासी बच्चों के लिए संदेश है कि सपनों की कोई जाति नहीं होती और लोकतंत्र के दरवाजे उनके लिए भी उतने ही खुले हैं।
अब केवल अधिकार मांगने का नहीं, अधिकार जानने का समय है। आदिवासी समाज की अगली लड़ाई शायद पहले की लड़ाइयों से अलग होगी।
अब सिर्फ सड़क पर संघर्ष नहीं, कानून की समझ भी हथियार होगी।
वनाधिकार, ग्रामसभा की भूमिका, भूमि अधिकार, शिक्षा, रोजगार, पर्यावरणीय अधिकार और संवैधानिक संरक्षण—इन सबकी जानकारी आदिवासी युवा पीढ़ी की सबसे बड़ी ताकत बन सकती है। जिस हाथ में कभी सिर्फ परंपरागत औजार था, उसी हाथ में आज किताब, मोबाइल और तकनीक भी होनी चाहिए। शिक्षा से शक्ति, संविधान से अधिकार और संगठन से आवाज—यही आने वाले समय का आदिवासी आंदोलन होना चाहिए।
सरकारों से भी एक सीधा सवाल
हर सरकार आदिवासी हितों की बात करती है। घोषणाएं होती हैं। योजनाएं बनती हैं। सम्मेलन होते हैं। भाषण होते हैं। लेकिन विश्व आदिवासी दिवस का सबसे जरूरी सवाल भाषणों से बाहर है—
क्या योजनाओं का लाभ वास्तव में उस आखिरी आदिवासी परिवार तक पहुंच रहा है? क्या दूरस्थ गांव का बच्चा गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पा रहा है? क्या आदिवासी युवा को स्थानीय स्तर पर सम्मानजनक रोजगार मिल रहा है? क्या विस्थापन के बाद उसका जीवन पहले से बेहतर हुआ? क्या उसकी ग्रामसभा की आवाज वास्तव में निर्णय प्रक्रिया को प्रभावित करती है? क्या जंगल और वनोपज से उसकी आजीविका सुरक्षित है?
और सबसे बड़ा सवाल—
क्या विकास की मेज पर उस समाज को भी कुर्सी मिली है, जिसकी जमीन पर विकास की इमारत खड़ी की जा रही है?
इन सवालों के जवाब ही तय करेंगे कि हमारी विकास नीति वास्तव में समावेशी है या केवल आंकड़ों में सुंदर दिखाई देती है। अब आदिवासी समाज को कोई परिभाषित नहीं करेगा—वह स्वयं अपनी पहचान लिखेगा
आज आवश्यकता आदिवासी समाज पर दया करने की नहीं, उसके अधिकारों का सम्मान करने की है।
उसे मुख्यधारा में लाने की बात भी अपने आप में गलत है, क्योंकि आदिवासी समाज इस देश की मुख्यधारा से बाहर कभी था ही नहीं।
वह भारत की मूल सामाजिक-सांस्कृतिक धारा का महत्वपूर्ण हिस्सा है।उसकी भाषा बचेगी तो भारत की भाषाई विविधता बचेगी।
उसकी संस्कृति बचेगी तो भारत की सांस्कृतिक विविधता बचेगी। उसके जंगल बचेंगे तो हमारी पर्यावरणीय सुरक्षा मजबूत होगी। उसकी जमीन और आजीविका सुरक्षित होगी तो विकास अधिक न्यायपूर्ण होगा। इसलिए आज विश्व आदिवासी दिवस पर सिर्फ इतना कहना पर्याप्त नहीं कि “आदिवासी समाज को शुभकामनाएं।”
आज कहना होगा— आपने सदियों तक जंगल बचाए हैं, अब अपने अधिकारों की भी रक्षा कीजिए। आपने अपनी संस्कृति को विपरीत परिस्थितियों में बचाया है, अब उसे नई पीढ़ी तक पहुंचाइए। आपने संघर्ष विरासत में पाया है, लेकिन भविष्य संघर्ष के साथ-साथ शिक्षा, संविधान और लोकतांत्रिक शक्ति से बनाइए।
और सत्ता, समाज तथा उद्योग जगत को भी यह याद रखना होगा— आदिवासी विकास का विरोधी नहीं है। वह उस विकास का विरोधी है जिसमें उसकी आवाज नहीं होती।
छत्तीसगढ़ की धरती पर विकास की नई कहानी लिखनी है तो उसमें सिर्फ कारखानों की चिमनियां, सड़कों की लंबाई और उत्पादन के आंकड़े नहीं होने चाहिए। उसमें जंगल की हरियाली भी होनी चाहिए।
नदियों का स्वच्छ प्रवाह भी होना चाहिए। गांव की मुस्कान भी होनी चाहिए। आदिवासी संस्कृति की धड़कन भी होनी चाहिए। और सबसे बढ़कर—उस इंसान का सम्मान होना चाहिए, जिसने पीढ़ियों तक इस धरती को संभालकर रखा है क्योंकि सवाल सिर्फ आदिवासी समाज का नहीं है।
सवाल यह है कि हम कैसा छत्तीसगढ़ बनाना चाहते हैं—
ऐसा छत्तीसगढ़ जहां जमीन से सिर्फ खनिज निकले,
या ऐसा छत्तीसगढ़ जहां विकास के साथ इंसान भी सुरक्षित रहे?
विश्व आदिवासी दिवस पर यही सबसे बड़ा संकल्प होना चाहिए—
जल, जंगल, जमीन और जन—चारों का सम्मान होगा, तभी छत्तीसगढ़ का विकास वास्तव में महान होगा। आदिवासी झुकेगा नहीं। अपनी पहचान छोड़ेगा नहीं। अपने अधिकारों से पीछे हटेगा नहीं। और अब वह सिर्फ अपनी कहानी सुनाएगा नहीं—अपनी कहानी खुद लिखेगा।
(साभार – पंकज तिवारी)
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