स्टाइपेंड विसंगति पर फूटा आक्रोश: रायगढ़ मेडिकल कॉलेज के 62 इंटर्न डॉक्टर अनिश्चितकालीन हड़ताल पर

Journalist Amardeep Chauhan
http://amarkhabar.com
रायगढ़, 5 अगस्त 2026। स्वर्गीय लखीराम अग्रवाल स्मृति शासकीय चिकित्सा महाविद्यालय, रायगढ़ में कार्यरत 62 एमबीबीएस इंटर्न डॉक्टरों ने लंबे समय से लंबित स्टाइपेंड वृद्धि की मांग को लेकर बुधवार से अनिश्चितकालीन हड़ताल शुरू कर दी है। अस्पताल के मुख्य द्वार पर जुटे इंटर्न डॉक्टरों ने नारेबाजी करते हुए शासन के खिलाफ अपना रोष प्रकट किया। इससे पहले वे काली पट्टी बांधकर सांकेतिक विरोध जता चुके थे और जिला प्रशासन को ज्ञापन सौंप चुके थे, लेकिन ठोस निर्णय नहीं होने से अब उन्होंने काम बंद कर दिया है।
इंटर्न डॉक्टरों का कहना है कि छत्तीसगढ़ में उन्हें प्रतिमाह मात्र 15,900 रुपये का स्टाइपेंड दिया जा रहा है, जो न केवल अन्य राज्यों की तुलना में बेहद कम है बल्कि वर्तमान महंगाई के दौर में बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए भी अपर्याप्त है। डॉक्टरों ने पड़ोसी राज्यों का उदाहरण देते हुए बताया कि ओडिशा में इंटर्न को लगभग 44 हजार रुपये, पश्चिम बंगाल में करीब 43 हजार रुपये और कई अन्य राज्यों में 30 हजार रुपये से अधिक स्टाइपेंड दिया जा रहा है। ऐसे में छत्तीसगढ़ के इंटर्न खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं।
प्रदर्शन में शामिल इंटर्न डॉक्टर छबि सिंगोदिया ने कहा कि वे पिछले कई महीनों से शासन का ध्यान इस ओर आकर्षित करने का प्रयास कर रहे हैं। “हमें हर बार आश्वासन मिला, लेकिन जमीनी स्तर पर कोई निर्णय नहीं हुआ। मजबूर होकर अब हमें हड़ताल का रास्ता अपनाना पड़ा है,” उन्होंने कहा। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि सभी 62 इंटर्न अपनी नियमित ड्यूटी से अलग रहकर आंदोलन कर रहे हैं और सरकार से शीघ्र सकारात्मक निर्णय की अपेक्षा रखते हैं।
इधर, इंटर्न डॉक्टरों की गैरमौजूदगी का असर अस्पताल की कार्यप्रणाली पर दिखने लगा है। ओपीडी, वार्ड और आपातकालीन सेवाओं में वरिष्ठ डॉक्टरों पर अतिरिक्त दबाव बढ़ गया है। हालांकि मेडिकल कॉलेज प्रबंधन का दावा है कि मरीजों के उपचार पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ा है। कॉलेज के डीन डॉ. संतोष कुमार ने कहा कि इंटर्न डॉक्टर प्रशिक्षु होते हैं और उनकी अनुपस्थिति के बावजूद उपचार व्यवस्था सुचारू रूप से संचालित की जा रही है। उन्होंने यह भी जोड़ा कि हड़ताल से सबसे अधिक नुकसान स्वयं इंटर्न डॉक्टरों का ही हो रहा है, क्योंकि इससे उनका प्रशिक्षण प्रभावित हो रहा है।
फिलहाल, यह मुद्दा केवल स्टाइपेंड बढ़ोतरी तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह राज्य में मेडिकल शिक्षा और प्रशिक्षु डॉक्टरों के कार्य-परिस्थितियों से जुड़ा व्यापक प्रश्न बनता जा रहा है। यदि समय रहते समाधान नहीं निकला, तो इसका असर स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता और मेडिकल छात्रों के मनोबल पर भी पड़ सकता है।
अब सबकी नजर शासन के अगले कदम पर टिकी है—क्या सरकार इंटर्न डॉक्टरों की मांगों पर त्वरित निर्णय लेकर स्थिति को सामान्य करेगी, या यह गतिरोध और लंबा खिंचेगा।
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