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तमनार में ऐश स्लरी पाइपलाइन विवाद सुलझा: प्रशासन की पहल पर किसानों को 40 करोड़ की पहली राहत, जिंदल पावर..

Journalist Amardeep Chauhan
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जिला प्रशासन की प्रभावी पहल रंग लाई, जिंदल पावर लिमिटेड ने प्रभावित 60 किसान परिवारों के लिए जारी की 40 करोड़ रुपए की पहली किस्त


जिला प्रशासन की सक्रिय कार्रवाई से वर्षों पुरानी मांग का समाधान, किसानों के वैधानिक हित हुए संरक्षित

रायगढ़, 31 जुलाई 2026। रायगढ़ जिले के तमनार क्षेत्र में एक लंबित विवाद का समाधान  जमीन पर उतरते हुए दिखाई दे रहा है। प्रशासनिक हस्तक्षेप के बीच जिला प्रशासन ने जिंदल पावर लिमिटेड की ऐश स्लरी पाइपलाइन से प्रभावित किसानों को बड़ी राहत दिलाते हुए 40 करोड़ रुपये की पहली किस्त जारी करवाई है।

यह मामला घरघोड़ा विकासखंड के तमनार क्षेत्र का है, जहां  द्वारा फ्लाई ऐश के परिवहन के लिए करीब 6.7 किलोमीटर लंबी ऐश स्लरी पाइपलाइन बिछाई गई थी। इस परियोजना के लिए चार गांव—बुड़िया, बागबाड़ी, झिकाबहाल और लिबरा—के 60 किसान परिवारों की कुल 52.64 एकड़ निजी भूमि का उपयोग किया गया। पाइपलाइन बिछने के बाद से ही किसान उचित मुआवजे की मांग को लेकर लगातार प्रशासन के दरवाजे खटखटा रहे थे।

लंबे समय तक समाधान न निकलने से नाराज किसानों ने जनदर्शन सहित विभिन्न मंचों पर अपनी शिकायत दर्ज कराई। इसके बाद जिला प्रशासन हरकत में आया। मामले को गंभीरता से लेते हुए घरघोड़ा के अनुविभागीय राजस्व अधिकारी प्रवीण तिवारी को विस्तृत जांच के निर्देश दिए। जांच में किसानों की शिकायतें तथ्यात्मक रूप से सही पाई गईं और यह स्पष्ट हुआ कि उन्हें नियमानुसार मुआवजा नहीं मिला था।

इसके बाद प्रशासन ने सख्त रुख अपनाया। कलेक्टर ने कंपनी प्रबंधन को तलब कर स्पष्ट निर्देश दिए कि प्रभावित किसानों को उनके वैधानिक अधिकारों के अनुरूप मुआवजा दिया जाए। प्रशासन की सतत निगरानी और दबाव का ही परिणाम रहा कि कंपनी को झुकना पड़ा और किसानों के लिए 40 करोड़ रुपये की पहली किस्त जारी कर दी गई।

अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) घरघोड़ा  के अनुसार, वर्ष 2025 में पाइपलाइन निर्माण के दौरान किसानों की भूमि का उपयोग किया गया था, लेकिन मुआवजा प्रक्रिया अधूरी रह गई थी। अब भुगतान की शुरुआत होने से प्रभावित परिवारों को राहत मिली है, हालांकि पूरी राशि के भुगतान और अन्य दावों पर अभी नजर बनी हुई है।

इस पूरे घटनाक्रम का एक दूसरा पहलू भी है। ऐश स्लरी पाइपलाइन को तकनीकी रूप से पर्यावरण के लिहाज से बेहतर विकल्प माना जाता है, क्योंकि इससे फ्लाई ऐश का परिवहन वैज्ञानिक तरीके से होता है, सड़कों पर भारी वाहनों का दबाव घटता है और धूल प्रदूषण में कमी आती है। लेकिन विकास परियोजनाओं के साथ स्थानीय लोगों के अधिकारों की अनदेखी अक्सर विवाद की वजह बनती रही है। तमनार का यह मामला भी उसी कड़ी का उदाहरण था।

जिला प्रशासन ने इस बार संतुलन साधने की कोशिश की—एक ओर औद्योगिक गतिविधियों को बाधित किए बिना, दूसरी ओर किसानों के अधिकारों को सुनिश्चित करते हुए। प्रशासनिक हस्तक्षेप का यह मॉडल बताता है कि यदि इच्छाशक्ति हो तो लंबित विवादों का समाधान संभव है।

फिलहाल, पहली किस्त जारी होने के बाद प्रभावित किसानों में संतोष का माहौल है, लेकिन उनकी निगाहें आगे की भुगतान प्रक्रिया और स्थायी समाधान पर टिकी हैं। यह मामला आने वाले समय में प्रशासन और उद्योगों के बीच जवाबदेही के मानक तय करने में भी अहम भूमिका निभा सकता है।

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Amar Chouhan

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