घरघोड़ा में करोड़ों की पैतृक भूमि पर ‘खेल’: बंटवारे से पहले नामांतरण और फिर उद्योग को रजिस्ट्री; सवालों के घेरे में राजस्व अमला

Journalist Amardeep Chauhan
http://amarkhabar.com
रायगढ़/घरघोड़ा। कहते हैं कि न्याय की नींव निष्पक्षता पर टिकी होती है, लेकिन जब रक्षक ही भक्षक की भूमिका में नजर आने लगें, तो व्यवस्था से आम आदमी का भरोसा उठने लगता है। छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले के घरघोड़ा तहसील अंतर्गत ग्राम चारमार से सामने आया ताजा मामला कुछ ऐसा ही इशारा कर रहा है। यहाँ एक रसूखदार निजी कंपनी, कुछ तथाकथित खरीदार और स्थानीय राजस्व अमले के बीच एक ऐसा कथित त्रिकोण बनता दिख रहा है, जिसने एक किसान परिवार को उनकी करोड़ों रुपये की पैतृक जमीन से बेदखल करने की जमीन तैयार कर दी।
बिना किसी वैध बंटवारे के, बिना सभी हिस्सेदारों की सहमति के, रातों-रात सरकारी फाइलों में ऐसा ‘जादू’ हुआ कि करोड़ों की पैतृक भूमि का नामांतरण हो गया और आनन-फानन में उसकी रजिस्ट्री एक निजी स्पंज आयरन कंपनी के नाम दर्ज कर दी गई।
क्या है पूरा मामला? साझी विरासत पर अकेले का ‘हस्ताक्षर’
मामले की गहराई में जाएं तो पीड़ित पक्ष चिंतामणी गुप्ता और सरधाकर गुप्ता की ग्राम चारमार में करीब 71.767 हेक्टेयर (लगभग 177 एकड़) पैतृक कृषि भूमि है। यह जमीन आज भी राजस्व अभिलेखों में संयुक्त खाते (साझा खाते) के रूप में दर्ज है। नियमतः जब तक किसी संयुक्त खाते का विधिवत कानूनी बंटवारा नहीं हो जाता, तब तक किसी भी एक हिस्सेदार को पूरी जमीन या उसके किसी खास हिस्से को अपने स्तर पर बेचने या नामांतरण कराने का अधिकार नहीं होता।
विवाद की गंभीरता इस बात से समझी जा सकती है कि इस जमीन के बंटवारे का प्रकरण पहले से ही नायब तहसीलदार न्यायालय में विचाराधीन (लंबित) है। इसके बावजूद, कानून और स्थापित प्रक्रियाओं को धता बताते हुए कुछ खसरा नंबरों का नामांतरण आनन-फानन में अन्य व्यक्तियों के नाम पर चढ़ा दिया गया।
पत्रकारिता का यक्ष प्रश्न: जब बंटवारे का मामला खुद राजस्व न्यायालय के समक्ष विचाराधीन था, तो किस कानून के तहत और किसके इशारे पर इस संयुक्त खाते की भूमि का नामांतरण दूसरे पक्षों के नाम कर दिया गया? क्या स्थानीय पटवारी और तहसीलदार को इस लंबित विवाद की जानकारी नहीं थी, या जानकर भी आंखें मूंद ली गईं?
विरोध हुआ तो ‘सुधार’ के नाम पर रिकॉर्ड से छेड़छाड़ का संगीन आरोप
इस पूरे मामले में सबसे चौंकाने वाला पहलू शिकायत के बाद की प्रशासनिक हलचल है। शिकायतकर्ताओं का सीधा आरोप है कि जब उन्होंने इस अवैध नामांतरण का विरोध किया और जिला प्रशासन व वरिष्ठ अधिकारियों से शिकायत की, तो अपनी गर्दन फंसती देख संबंधित राजस्व विभाग के कर्मचारियों ने डिजिटल और कागजी रिकॉर्ड्स में पिछले दरवाजे से संशोधन कर दिए।
आरोप है कि यह संशोधन किसी भूल को सुधारने के लिए नहीं, बल्कि पहले की गई अवैध नामांतरण की प्रक्रिया को कागजी तौर पर ‘वैध’ साबित करने के लिए किया गया। यदि इस आरोप में रत्ती भर भी सच्चाई है, तो यह सीधे तौर पर शासकीय अभिलेखों में कूटरचना का बेहद गंभीर मामला बनता है, जो पूरे जिले के राजस्व विभाग की साख को कटघरे में खड़ा करता है।
5 मई का ‘तारीख पे खेल’ और कॉर्पोरेट जल्दबाजी
शिकायत के दस्तावेजों के मुताबिक, 5 मई 2026 को इस विवादित भूमि की रजिस्ट्री बी.एस. स्पंज प्राइवेट लिमिटेड के पक्ष में करा दी गई। पीड़ित पक्ष का दावा है कि इस रजिस्ट्री की बुनियाद ही पूरी तरह से फर्जी और कूटरचित दस्तावेजों पर टिकी हुई है।
आमतौर पर कोई भी बड़ी कंपनी भूमि अधिग्रहण या खरीद से पहले ‘टाइटेल क्लियरेंस’ (स्वामित्व जांच) करवाती है। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि:
क्या बी.एस. स्पंज प्रा. लि. को इस बात की भनक नहीं थी कि जमीन संयुक्त खाते की है और मामला न्यायालय में है?
या फिर कंपनी ने सब कुछ जानते हुए भी स्थानीय तंत्र के प्रभाव का इस्तेमाल कर इस सौदे को अंजाम दिया?
शिकायतें फाइलों में दबीं, जमीन पर गरज रही हैं मशीनें
यह मामला सिर्फ कागजी हेराफेरी तक सीमित नहीं है। धरातल पर स्थिति तनावपूर्ण है। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि उन्होंने मामले की शिकायत प्रशासन से की है और जांच लंबित है, लेकिन दूसरी तरफ विवादित भूमि पर उक्त कंपनी द्वारा धड़ल्ले से बाउंड्री वॉल, पिलर खड़े करने और अन्य निर्माण कार्य जारी हैं।
पीड़ित परिवार ने मौके के फोटो और वीडियो साक्ष्य के तौर पर जुटाए हैं, जो यह साबित करते हैं कि शिकायत की प्रक्रिया को ठंडे बस्ते में डालकर जमीन पर कब्जा करने की कोशिशें तेज कर दी गई हैं। अब पीड़ित पक्ष अपनी आखिरी उम्मीद लेकर जिला कलेक्टर की चौखट पर दस्तक देने की तैयारी में है।
हमारा दृष्टिकोण: जिला प्रशासन के लिए साख की परीक्षा
यह मामला केवल दो पक्षों के बीच जमीन की लड़ाई का नहीं है, बल्कि यह इस बात का लिटमस टेस्ट है कि क्या रायगढ़ प्रशासन में बैठे जिम्मेदार अधिकारी रसूखदारों के प्रभाव से मुक्त होकर काम कर सकते हैं।
राजस्व विभाग के कुछ निचले स्तर के कर्मचारियों की संदेहास्पद भूमिका ने पूरे महकमे को संदेह के घेरे में ला दिया है। अब गेंद जिला कलेक्टर और वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों के पाले में है।
पहला कदम: जब तक जांच पूरी नहीं हो जाती, तब तक विवादित खसरों पर चल रहे निर्माण कार्य पर तत्काल प्रभाव से ‘यथास्थिति’ का आदेश जारी कर काम रोका जाना चाहिए।
दूसरा कदम: एक उच्च स्तरीय स्वतंत्र जांच कमेटी बनाई जाए, जो यह जांचे कि नायब तहसीलदार कोर्ट में लंबित मामले के दौरान नामांतरण और रजिस्ट्री की अनुमति किसने और कैसे दी।
यदि समय रहते इस मामले में निष्पक्ष कदम नहीं उठाए गए, तो यह संदेश जाएगा कि रायगढ़ में कानून की धाराओं से ज्यादा रसूख और सांठगांठ की ताकत चलती है। जनता की निगाहें अब जिला प्रशासन के अगले कदम पर टिकी हैं।
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