प्रशासनिक अनुभव और योग्यता का नया सियासी समीकरण; क्या सारंगढ़-सरायपाली में ‘चौधरी मॉडल’ दोहराएंगे पूर्व कलेक्टर केएल चौहान?

Journalist Amardeep Chauhan
http://amarkhabar.com
सारंगढ़/सरायपाली। छत्तीसगढ़ की सियासत में नौकरशाहों का प्रशासनिक अनुभव और उनकी सांगठनिक योग्यता हमेशा से राजनीतिक दलों के लिए तुरुप का इक्का साबित होती रही है। पूर्व आईएएस और वर्तमान वित्त मंत्री की राह पर चलते हुए अब सरायपाली अंचल और नवनिर्मित सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिले की राजनीति में एक और बड़ा नाम तेजी से उभर रहा है—पूर्व कलेक्टर केएल चौहान।
क्षेत्रीय गलियारों और विश्वसनीय सूत्रों से छनकर आ रही खबरें इस बात की पुरजोर तस्दीक कर रही हैं कि केएल चौहान जल्द ही पार्टी का दामन थामकर अपनी नई राजनीतिक पारी का आगाज कर सकते हैं। चर्चाएं तो यहां तक हैं कि आगामी विधानसभा चुनावों में पार्टी उनकी प्रशासनिक साख और लोकप्रियता को देखते हुए उन्हें सारंगढ़ या सरायपाली विधानसभा सीट से चुनावी समर में उतार सकती है। हालांकि, इस संवेदनशील विषय पर अभी भाजपा संगठन या स्वयं केएल चौहान की ओर से कोई आधिकारिक मुहर नहीं लगाई गई है।
सेवानिवृत्ति के बाद सामाजिक सक्रियता: राजनीति की जमीनी बिसात?
शासकीय सेवा से निवृत्त होने के बाद केएल चौहान ने घर बैठने के बजाय समाज सेवा को अपनी अगली प्राथमिकता बनाया है। पिछले कुछ महीनों में सरिया, सारंगढ़ और इसके सीमावर्ती इलाकों में उनकी मौजूदगी अप्रत्याशित रूप से बढ़ी है। वे केवल मंचों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि युवाओं, विभिन्न सामाजिक संगठनों और प्रबुद्ध जनों के बीच जाकर सीधा संवाद स्थापित कर रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उनकी यह सामाजिक सक्रियता महज संयोग नहीं, बल्कि एक सोची-समझी जमीनी बिसात है। हाल ही में सरिया में आयोजित एक सामाजिक कार्यक्रम के दौरान जब एक संवाददाता ने उनसे सक्रिय राजनीति और आगामी चुनाव लड़ने की संभावनाओं पर सीधा सवाल दागा, तो प्रशासनिक परिपक्वता का परिचय देते हुए उन्होंने मुस्कुराकर कहा:
“यह भविष्य के गर्त में है। अभी इस विषय पर किसी भी तरह की टिप्पणी करना जल्दबाजी होगी।”
उनका यह सधा हुआ और संक्षिप्त जवाब भले ही किसी फैसले की घोषणा न करता हो, लेकिन यह कयासों को खारिज भी नहीं करता, जिससे इस सुगबुगाहट को और हवा मिल गई है।
प्रशासनिक अनुभव और योग्यता ही सबसे बड़ी पूंजी
बातचीत के दौरान केएल चौहान ने अपने सेवाकाल के अनुभवों को साझा करते हुए जो बातें कहीं, वह उनकी कार्यकुशलता और योग्यता को स्पष्ट दर्शाती हैं। उन्होंने माना कि आज के दौर में नौकरशाही और प्रशासनिक जिम्मेदारियां पहले की तुलना में कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण हो चुकी हैं। विपरीत परिस्थितियों में काम करना पड़ता है, लेकिन उनकी सबसे बड़ी ताकत जनता का भरोसा रही है।
उल्लेखनीय है कि केएल चौहान का प्रशासनिक जीवन का एक लंबा और महत्वपूर्ण हिस्सा बस्तर जैसे संवेदनशील और चुनौतीपूर्ण क्षेत्र में बीता। बस्तर की कठिन भौगोलिक और सामाजिक परिस्थितियों के बीच उन्होंने जिस सूझबूझ, पारदर्शिता और योग्यता के साथ जनता का विश्वास जीता, वही उनकी प्रशासनिक कुशलता का सबसे बड़ा प्रमाण माना जाता है।
विकास का खाका और भविष्य की दृष्टि
सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिले को लेकर केएल चौहान के पास एक स्पष्ट विजन दिखाई देता है। वे इसे असीमित संभावनाओं वाला जिला मानते हैं। ओडिशा की सीमा से लगे होने के कारण यहां की सांस्कृतिक विविधता को वे एक विशिष्ट ताकत के रूप में देखते हैं।
एक कुशल प्रशासक के रूप में अपनी योग्यता का परिचय देते हुए उन्होंने बताया कि उनके कलेक्टोरेट कार्यकाल के दौरान जिले के सभी विकासखंडों की जमीनी आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए विस्तृत विकास योजनाएं तैयार कर शासन को भेजी गई थीं। क्षेत्र के समग्र विकास को लेकर वे आज भी उतने ही संजीदा हैं और उन्हें उम्मीद है कि भविष्य में सारंगढ़ रेल परियोजना को गति मिलेगी, जो इस पिछड़े अंचल के भाग्य को बदलने में मील का पत्थर साबित होगी।
युवाओं की टोली और बदलती सियासत के मायने
केएल चौहान के इस सामाजिक और जनहितैषी अभियान में उजागर नंद, राजेंद्र गुरु सहित अंचल के बड़ी संख्या में ऊर्जावान युवा कंधे से कंधा मिलाकर चल रहे हैं। सामाजिक मंचों पर उनके साथ भाजपा अनुसूचित जाति मोर्चा के जिला उपाध्यक्ष संजय चौहान, भाजपा महिला मोर्चा सरिया मंडल अध्यक्ष रजनी चौहान तथा जिला महिला मोर्चा सदस्य मीना चौहान जैसी राजनीतिक हस्तियों की मौजूदगी इस बात का स्पष्ट संकेत है कि परदे के पीछे की पटकथा तैयार की जा रही है।
छत्तीसगढ़ के राजनीतिक इतिहास पर नजर डालें तो प्रशासनिक सेवा से राजनीति में आने वाले चेहरों को जनता ने हाथों-हाथ लिया है। रायगढ़ की धरती से ही निकले ओपी चौधरी इसका साक्षात उदाहरण हैं। ऐसे में यदि केएल चौहान अपनी योग्यता और प्रशासनिक अनुभव की पूंजी के साथ सक्रिय राजनीति में कदम रखते हैं, तो सारंगढ़ और सरायपाली का राजनीतिक समीकरण पूरी तरह बदलना तय है। फिलहाल, समूचे अंचल की निगाहें पूर्व कलेक्टर के अगले कदम और पार्टी के संभावित फैसले पर टिकी हुई हैं।
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