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कोटवारों का सब्र टूटा, सम्मान और हक़ की लड़ाई अब सड़कों तक पहुंचने के संकेत”

Journalist Amardeep chauhan
http://amarkhabar.com

घरघोड़ा/रायगढ़।
ग्रामीण प्रशासन की रीढ़ माने जाने वाले कोटवार अब अपने ही हक़ के लिए आवाज़ बुलंद करने को मजबूर हो गए हैं। वर्षों से लंबित मांगों और उपेक्षा के आरोपों के बीच कोटवार एसोसिएशन ऑफ छत्तीसगढ़ की घरघोड़ा इकाई ने मुख्यमंत्री के नाम एक विस्तृत ज्ञापन सौंपकर शासन को स्पष्ट संकेत दे दिया है—अब इंतज़ार की सीमा खत्म हो चुकी है।

ज्ञापन अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) दुर्गा प्रसाद अधिकारी को सौंपा गया, जहां तहसीलदार मनोज गुप्ता और थाना प्रभारी कुमार गौरव साहू भी मौजूद रहे। ज्ञापन का लहजा विनम्र जरूर था, लेकिन शब्दों में वर्षों की पीड़ा और व्यवस्था से निराशा साफ झलक रही थी।

“काम पूरा, हक अधूरा” — कोटवारों का आरोप

कोटवारों का कहना है कि वे दशकों से शासन-प्रशासन के सबसे निचले लेकिन सबसे महत्वपूर्ण स्तर पर काम कर रहे हैं। गांवों में सरकारी सूचनाएं पहुंचाने से लेकर राजस्व विभाग की मदद, कानून-व्यवस्था में सहयोग और आपात स्थितियों की सूचना देने तक—हर जिम्मेदारी वे निभाते हैं।
फिर भी न तो उन्हें नियमित कर्मचारी का दर्जा मिला, न ही सामाजिक सुरक्षा।

ज्ञापन में यह भी उल्लेख है कि कई कोटवार पीढ़ियों से सेवा दे रहे हैं, लेकिन आज तक उनकी स्थिति “मानदेय आधारित अस्थायी कर्मी” से आगे नहीं बढ़ पाई।

वेतन विसंगति और श्रेणीकरण पर सवाल

मौजूदा व्यवस्था में कोटवारों को सेवा भूमि के आधार पर अलग-अलग श्रेणियों में बांटकर 3000 से 6000 रुपये तक का मानदेय दिया जा रहा है, जिसे उन्होंने “महंगाई के इस दौर में अपमानजनक” बताया।
संघ ने स्पष्ट मांग रखी है कि—

न्यूनतम मानदेय 15,000 रुपये किया जाए

अन्य श्रेणियों में भी 8000 से 12000 रुपये तक संशोधन हो

नियुक्ति और कार्रवाई प्रक्रिया पर भी आपत्ति

ज्ञापन में यह गंभीर आरोप भी लगाया गया है कि—

शिकायतों की निष्पक्ष जांच के बिना कोटवारों पर कार्रवाई की जा रही है

बिना पक्ष सुने निलंबन/पदच्युत करने की घटनाएं बढ़ी हैं

नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता नहीं है, और नियमों की अनदेखी हो रही है


संघ ने मांग की है कि किसी भी कार्रवाई से पहले विधिवत जांच और सुनवाई अनिवार्य की जाए।

“बेगार” जैसे हालात, आदेशों की अनदेखी

कोटवारों ने यह भी आरोप लगाया कि राजस्व अधिकारियों द्वारा उनसे उनके मूल कार्यों से हटकर अन्य काम करवाए जा रहे हैं, जो शासन के निर्देशों के खिलाफ है। इसे उन्होंने “बेगार प्रथा जैसा शोषण” बताया और तत्काल रोक लगाने की मांग की।

नियमितीकरण और सामाजिक सुरक्षा सबसे बड़ी मांग

ज्ञापन का सबसे अहम बिंदु है—

कोटवारों को नियमित कर्मचारी का दर्जा

पेंशन, ग्रेच्युटी और अन्य शासकीय सुविधाएं

सेवा सुरक्षा और पारिवारिक आश्रितों को प्राथमिकता


संघ ने उच्चतम न्यायालय के हालिया निर्देशों का हवाला देते हुए 10 वर्ष सेवा पूर्ण करने वाले अस्थायी कर्मचारियों के नियमितीकरण की मांग भी दोहराई।

आंदोलन की चेतावनी

कोटवारों ने साफ शब्दों में कहा है कि यदि उनकी मांगों पर जल्द ठोस निर्णय नहीं लिया गया, तो वे चरणबद्ध लोकतांत्रिक आंदोलन का रास्ता अपनाएंगे।
यह आंदोलन केवल घरघोड़ा तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे प्रदेश में व्यापक रूप ले सकता है।


निर्णायक मोड़ की ओर बढ़ता असंतोष

ग्रामीण व्यवस्था का सबसे निचला लेकिन सबसे सक्रिय स्तंभ जब असंतोष में हो, तो उसके असर दूरगामी होते हैं। कोटवारों की यह एकजुटता और स्पष्ट चेतावनी प्रशासन के लिए संकेत है कि अब इस मुद्दे को टालना आसान नहीं होगा।

अगर समय रहते समाधान नहीं निकला, तो यह संघर्ष आने वाले दिनों में एक बड़े जनआंदोलन का रूप ले सकता है—जहां सवाल सिर्फ वेतन या पद का नहीं, बल्कि सम्मान और पहचान का होगा।

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Amar Chouhan

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