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“जनसुनवाई या जनअसंतोष? एनटीपीसी परियोजना पर 10 गांवों की एकजुट आपत्ति, समर्थन का एक भी स्वर नहीं” (देखें वीडियो)

Journalist Amardeep chauhan
http://amarkhabar.com

रायगढ़, 16/06/2026।
लारा क्षेत्र में प्रस्तावित एनटीपीसी परियोजना को लेकर आयोजित जनसुनवाई बुधवार को एक औपचारिक प्रक्रिया से ज्यादा जनआक्रोश के मंच में बदलती नजर आई। शाम करीब 7 बजे तक चली इस जनसुनवाई में प्रभावित 10 गांवों के ग्रामीणों ने लगभग एक स्वर में परियोजना का विरोध दर्ज कराया। उल्लेखनीय है कि पूरे कार्यक्रम के दौरान समर्थन में एक भी स्पष्ट आवाज सामने नहीं आई।

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भारत सरकार की नवरत्न कंपनी एनटीपीसी की इस परियोजना को लेकर पहले से ही क्षेत्र में असंतोष की स्थिति बनी हुई थी, लेकिन जनसुनवाई के दौरान जिस तरह से ग्रामीणों ने खुलकर अपनी आपत्तियां रखीं, उसने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

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रोजगार पर सबसे बड़ा सवाल
ग्रामीणों की आपत्तियों का केंद्र बिंदु रोजगार रहा। कई वक्ताओं ने आरोप लगाया कि स्थानीय युवाओं को रोजगार देने के नाम पर भारी-भरकम रकम की मांग की जाती है। जनसुनवाई में उपस्थित लोगों ने खुलकर कहा कि नौकरी के बदले 30 हजार से लेकर 40-50 हजार रुपये तक की कथित ‘लेन-देन’ की बात सामने आती रही है।
हालांकि, इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हो सकी है, लेकिन मंच से बार-बार उठी इस शिकायत ने पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर दिए।

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‘विकास’ बनाम ‘विश्वास’ का टकराव
एनटीपीसी जैसी बड़ी सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी से जहां स्थानीय स्तर पर विकास, रोजगार और बुनियादी सुविधाओं की अपेक्षा की जाती है, वहीं लारा क्षेत्र की जनसुनवाई में यह भरोसा कमजोर पड़ता दिखा। ग्रामीणों का कहना था कि पहले से चल रही गतिविधियों के बावजूद उन्हें न तो पर्याप्त रोजगार मिला, न ही जीवन स्तर में अपेक्षित सुधार देखने को मिला।

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अनुत्तरित सवालों की लंबी सूची
जनसुनवाई के दौरान पर्यावरणीय प्रभाव, विस्थापन, मुआवजा, रोजगार नीति और स्थानीय सहभागिता जैसे मुद्दों पर कई सवाल उठे। लेकिन ग्रामीणों का आरोप रहा कि अधिकांश सवालों का संतोषजनक जवाब नहीं मिल पाया।
विशेष रूप से यह मुद्दा प्रमुख रहा कि यदि परियोजना का विस्तार होता है, तो प्रभावित परिवारों के पुनर्वास और आजीविका का ठोस खाका क्या होगा।

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प्रक्रिया बनाम भरोसे का संकट
जनसुनवाई लोकतांत्रिक प्रक्रिया का अहम हिस्सा है, जहां प्रभावित समुदाय की सहमति और सुझावों को महत्व दिया जाता है। लेकिन लारा की यह जनसुनवाई इस सवाल को जन्म देती है कि क्या केवल प्रक्रिया पूरी करना पर्याप्त है, या फिर विश्वास अर्जित करना भी उतना ही जरूरी है?

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इस पूरे घटनाक्रम ने यह स्पष्ट कर दिया है कि परियोजना के भविष्य से ज्यादा महत्वपूर्ण अब स्थानीय समुदाय का विश्वास बन चुका है। यदि संबंधित एजेंसियां और कंपनी समय रहते संवाद, पारदर्शिता और जवाबदेही पर ध्यान नहीं देतीं, तो यह विरोध आगे और व्यापक रूप ले सकता है।

फिलहाल, लारा की जनसुनवाई ने एक संदेश साफ कर दिया है—विकास योजनाएं तभी सफल हो सकती हैं, जब उनमें शामिल लोगों को उसका भागीदार बनाया जाए, केवल दर्शक नहीं।

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Amar Chouhan

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