“पहचान और अधिकार की आवाज़: आसनसोल महासम्मेलन में गूंजा ‘आदिवासी कॉलम’ का मुद्दा, राष्ट्रीय स्तर पर बनी रणनीति”

Journalist Amardeep chauhan
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आसनसोल (पश्चिम बंगाल)। भारती भवन, बर्नपुर (आसनसोल) में आयोजित सर्व आदिवासी समाज के राष्ट्रीय महासम्मेलन में देशभर से आए प्रतिनिधियों ने एक स्वर में अपनी पहचान, अस्तित्व और सांस्कृतिक अस्मिता को सशक्त करने का संकल्प दोहराया। इस महत्वपूर्ण आयोजन में पांचवीं और छठवीं अनुसूची क्षेत्रों के साथ-साथ विभिन्न राज्यों से जुड़े आदिवासी समाज के पदाधिकारियों और सामाजिक प्रमुखों की व्यापक भागीदारी रही।
सम्मेलन में छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, उड़ीसा, महाराष्ट्र, तेलंगाना, झारखंड, असम, बिहार, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल सहित कई राज्यों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। चर्चा का केंद्र आगामी जनगणना 2026-27 रहा, जिसमें आदिवासी समाज के लिए अलग “आदिवासी कॉलम” सुनिश्चित करने की मांग प्रमुख रूप से उठी। वक्ताओं ने कहा कि पूर्व की जनगणनाओं में जिस प्रकार आदिवासी पहचान दर्ज होती रही है, उसे पुनः उसी स्पष्टता और सम्मान के साथ दर्ज किया जाना आवश्यक है।
प्रतिनिधियों ने यह भी सहमति जताई कि इस मांग को केवल मंच तक सीमित न रखकर गांव-गांव तक पहुंचाया जाएगा। समाज के हर व्यक्ति तक इसकी जानकारी पहुंचाने और जागरूकता अभियान चलाने पर जोर दिया गया, ताकि जनगणना के दौरान कोई भी आदिवासी अपनी पहचान दर्ज कराने से वंचित न रहे।
महासम्मेलन में यह भी निर्णय लिया गया कि आने वाले समय में ऐसे राष्ट्रीय स्तर के आयोजन अन्य राज्यों में भी किए जाएंगे, जिससे एक व्यापक और संगठित मंच तैयार हो सके। वक्ताओं ने कहा कि आदिवासी समाज की एकजुटता ही उसके अधिकारों की सबसे बड़ी ताकत है।
इस सम्मेलन में छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले से भी सक्रिय भागीदारी देखने को मिली। गोंडवाना गोंड महासभा भारत के युवा प्रभाग के राष्ट्रीय अध्यक्ष कंदर्प राज सिदार के नेतृत्व में विनोद भगत, राजी दीवान, राजी पहाड़ा, दीपक लकड़ा उरांव, विजय भगत, कृत नारायण उरांव, कलानिधि उरांव, सुदर्शन उरांव, विजय बहादुर उरांव और धर्मिलाल उरांव सहित कई सामाजिक प्रतिनिधि शामिल हुए।
समापन सत्र में वक्ताओं ने दोहराया कि आदिवासी समाज की पहचान केवल आंकड़ों का विषय नहीं, बल्कि उसके इतिहास, संस्कृति और अस्तित्व से जुड़ा प्रश्न है। ऐसे में आने वाली जनगणना को समाज के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर के रूप में देखा जा रहा है, जहां संगठित प्रयासों से अपनी पहचान को सशक्त रूप से दर्ज कराया जा सकता है।
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