NTPC LARA “ विस्तार पर विराम: जनसुनवाई स्थगित, लेकिन सवाल जस के तस”

Freelance editor Amardeep chauhan @ http://amarkhabar.com
रायगढ़। औद्योगिक विस्तार की तेज रफ्तार के बीच एक बार फिर स्थानीय जनजीवन, पर्यावरण और पारदर्शिता के सवाल केंद्र में आ खड़े हुए हैं। छत्तीसगढ़ पर्यावरण संरक्षण मंडल द्वारा जारी सूचना के अनुसार, एनटीपीसी लारा सुपर थर्मल पावर प्रोजेक्ट के तीसरे चरण के विस्तार के लिए प्रस्तावित जनसुनवाई, जो 2 जून को महलोई में आयोजित होनी थी, उसे आगामी आदेश तक स्थगित कर दिया गया है।
यह निर्णय भले ही प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा हो, लेकिन इससे जुड़े सवाल और आशंकाएं अब और गहराती नजर आ रही हैं।
विस्तार की रफ्तार और बढ़ती चिंताएं
NTPC Limited के लारा संयंत्र में फिलहाल 1600 मेगावाट उत्पादन हो रहा है, जबकि दूसरे चरण के बाद यह क्षमता 3200 मेगावाट तक पहुंचने वाली है। तीसरे चरण में दो और 800-800 मेगावाट की इकाइयों के जुड़ने से कुल क्षमता 4800 मेगावाट तक पहुंच जाएगी।
लेकिन इस विकास के साथ सबसे बड़ा सवाल पर्यावरणीय दबाव और स्थानीय संसाधनों पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर उठ रहा है। प्रस्तावित तीसरे चरण के लिए लगभग 227 हेक्टेयर भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया सामने है, जिसमें निजी, शासकीय और वन भूमि शामिल है।
फ्लाई ऐश: बढ़ता पहाड़, घटती जवाबदेही
लारा परियोजना से निकलने वाली फ्लाई ऐश पहले ही स्थानीय लोगों के लिए चिंता का विषय बनी हुई है। वर्तमान में करीब 32 लाख टन वार्षिक ऐश उत्पादन हो रहा है, जबकि विस्तार के बाद इसके एक करोड़ टन से अधिक पहुंचने का अनुमान है।
ऐश डाइक में पहले से जमा लाखों टन राख का समुचित निस्तारण अब तक नहीं हो पाया है। ऐसे में उत्पादन बढ़ने के साथ इसके प्रबंधन को लेकर सवाल और गंभीर हो जाते हैं।
स्थानीय स्तर पर फ्लाई ऐश की अवैध डंपिंग की शिकायतें पहले भी उठती रही हैं, जिससे प्रशासन और परियोजना प्रबंधन की कार्यशैली पर भी सवाल खड़े होते रहे हैं।
जमीन, रोजगार और भरोसे का संकट
भूमि अधिग्रहण को लेकर ग्रामीणों में असंतोष कोई नई बात नहीं है। पूर्व में हुए भू-अर्जन और पुनर्वास से जुड़े विवाद अभी पूरी तरह शांत भी नहीं हुए हैं।
ग्रामीणों का आरोप है कि जमीन देने के बावजूद स्थायी रोजगार की गारंटी नहीं मिलती और अधिकतर युवाओं को ठेका आधारित अस्थायी काम तक सीमित रहना पड़ता है।
ऐसे में तीसरे चरण की प्रक्रिया शुरू होने से पहले ही भरोसे का संकट गहराता दिख रहा है।
जनसुनवाई स्थगित: राहत या संकेत?
जनसुनवाई का स्थगन प्रशासनिक दृष्टि से एक औपचारिक निर्णय हो सकता है, लेकिन स्थानीय लोगों के लिए यह राहत और अनिश्चितता, दोनों का संकेत है।
राहत इसलिए कि उन्हें अपनी बात रखने के लिए कुछ और समय मिल गया है, और अनिश्चितता इसलिए कि परियोजना का भविष्य किस दिशा में जाएगा, यह अभी साफ नहीं है।
आगे क्या?
अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि अगली तारीख कब तय होती है और क्या इस बीच परियोजना से जुड़े पर्यावरणीय और सामाजिक पहलुओं पर ठोस संवाद स्थापित हो पाता है या नहीं।
औद्योगिक विकास और पर्यावरणीय संतुलन के बीच संतुलन साधना हमेशा चुनौतीपूर्ण रहा है। लारा परियोजना का विस्तार भी इसी कसौटी पर परखा जाएगा—जहां सिर्फ उत्पादन नहीं, बल्कि लोगों का विश्वास और पर्यावरण की सुरक्षा भी उतनी ही अहम होगी।
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