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अडानी रेलवे साइडिंग और भाटिया-राजन कोलवॉशरी की वजह से खरसिया के गांवों में सड़क बनी ‘मौत का रास्ता’, धूल में घुलता बचपन”

Freelance editor Amardeep chauhan @ http://amarkhabar.com

खरसिया (रायगढ़)।
जिले के खरसिया विकासखंड के नवागांव, पामगढ़, राजघट्टा, छोटे डूमरपाली और बड़े डूमरपाली के ग्रामीण इन दिनों विकास की उस कीमत को चुका रहे हैं, जिसे उन्होंने कभी स्वीकार नहीं किया था। यहां की सड़कों पर दौड़ते भारी-भरकम हाइवा वाहन केवल कोयला ही नहीं ढो रहे, बल्कि गांवों की सांसें, सेहत और सुरक्षा भी अपने साथ रौंदते जा रहे हैं।

स्थानीय लोगों का आरोप है कि राजघट्टा ग्राम पंचायत में संचालित भाटिया-राजेंद्र कोलवॉशरी और बड़े डूमरपाली स्थित अडानी रेलवे साइडिंग से लगातार हो रही कोयला ढुलाई ने पूरे इलाके की जीवनशैली को बदहाल कर दिया है। दिन-रात सैकड़ों ट्रकों की आवाजाही से सड़कें पूरी तरह जर्जर हो चुकी हैं। हालात ऐसे हैं कि सड़क कम, गड्ढों और उड़ती धूल का जाल अधिक नजर आता है।

धूल में घुलता हर दिन, हर सांस
ग्रामीणों की पीड़ा शब्दों से अधिक उनके दैनिक जीवन में साफ झलकती है। सुबह घरों में रखे पानी के बर्तनों पर धूल की परत जमी मिलती है, तो रसोई में पकता भोजन भी इससे अछूता नहीं रह पाता। “निवाला उठाते हैं तो उसमें भी धूल का स्वाद आता है,” एक ग्रामीण ने कहा।

यह सिर्फ असुविधा नहीं, बल्कि स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन चुका है। लगातार उड़ते कोल डस्ट के कारण बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक में खांसी, दमा और अन्य श्वसन संबंधी बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं। ग्रामीणों का कहना है कि कंपनियों को मुनाफे से फुर्सत नहीं, गांव की जिंदगी उनकी प्राथमिकता में कहीं नहीं है।

मध्यान भोजन भी नहीं बचा प्रदूषण से
स्थिति की भयावहता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि गांव के स्कूल भी इस संकट से अछूते नहीं हैं। बच्चों के लिए बनने वाला मध्यान भोजन भी धूल की चपेट में आ रहा है। खुले वातावरण और लगातार उड़ती धूल के कारण भोजन की गुणवत्ता पर सवाल खड़े हो रहे हैं।

पोषण योजना के तहत मिलने वाला यही भोजन अब बच्चों के स्वास्थ्य के लिए खतरा बनता जा रहा है। अभिभावकों में इसे लेकर गहरी चिंता है, लेकिन विकल्प के अभाव में बच्चे वही भोजन करने को मजबूर हैं।

बरसात में ‘सड़क’ बनती है दलदल
गर्मी में जहां धूल से राहत नहीं, वहीं बारिश के दिनों में यही सड़कें दलदल में तब्दील हो जाती हैं। कोल डस्ट और कीचड़ के कारण सड़कें इतनी फिसलन भरी हो जाती हैं कि आए दिन लोग गिरकर चोटिल हो रहे हैं। गहरे गड्ढे दुर्घटनाओं को न्योता देते नजर आते हैं।

स्कूल जाने वाले बच्चों के लिए यह रास्ता किसी चुनौती से कम नहीं। कई बच्चे डर के कारण स्कूल जाने से बचने लगे हैं। अभिभावकों की चिंता हर दिन बढ़ती जा रही है।

आंदोलन, आश्वासन और फिर सन्नाटा
ग्रामीणों के मुताबिक, इस समस्या को लेकर कई बार चक्का जाम और धरना-प्रदर्शन किए जा चुके हैं। विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं ने भी मौके पर पहुंचकर समर्थन जताया, लेकिन परिणाम शून्य रहा। हर बार आश्वासन मिला, पर जमीनी स्तर पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं दिखी।

लोगों में यह धारणा गहराने लगी है कि कंपनियों के प्रभाव के आगे प्रशासन की सक्रियता कमजोर पड़ जाती है।


अब आर-पार की चेतावनी
लगातार अनदेखी से आक्रोशित ग्रामीणों ने अब सख्त रुख अपनाने का संकेत दिया है। उनका कहना है कि यदि जल्द ही सड़क निर्माण और धूल नियंत्रण के लिए ठोस उपाय नहीं किए गए, तो इस बार आंदोलन निर्णायक होगा।

“अब सिर्फ धरना नहीं, आर-पार की लड़ाई होगी,” ग्रामीणों ने स्पष्ट चेतावनी दी है।


सवाल जो जवाब मांगते हैं
इस पूरे घटनाक्रम के बीच कुछ बुनियादी सवाल खड़े होते हैं—
क्या औद्योगिक विकास की कीमत गांवों की सेहत और सुरक्षा से चुकाई जाएगी?
क्या बच्चों को धूल और बीमारियों के बीच ही भविष्य तलाशना होगा?
और सबसे अहम—प्रशासन आखिर कब इस गंभीर स्थिति पर ठोस हस्तक्षेप करेगा?

फिलहाल, इन गांवों की सड़कों पर दौड़ते हाइवा वाहन सिर्फ कोयला नहीं, बल्कि व्यवस्था की उदासीनता की कहानी भी बयां कर रहे हैं।

Amar Chouhan

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