डीएनए साक्ष्य अब जांच का ‘निर्णायक हथियार’: बिलासपुर रेंज में पुलिस अधिकारियों को दिया गया व्यवहारिक प्रशिक्षण

Freelance editor Amardeep chauhan @ http://amarkhabar.com
बिलासपुर, 5 मई। अपराध जांच की बदलती प्रकृति में वैज्ञानिक साक्ष्यों की भूमिका लगातार निर्णायक होती जा रही है। इसी कड़ी में बिलासपुर रेंज के पुलिस अधिकारियों के लिए डीएनए तथा जैविक/भौतिक साक्ष्य संकलन और परीक्षण पर केंद्रित एक दिवसीय ऑनलाइन कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की पहल रेंज के पुलिस महानिरीक्षक श्री राम गोपाल गर्ग ने की, जिसमें विभिन्न जिलों से जुड़े करीब 200 अधिकारियों और कर्मचारियों ने भाग लेकर प्रशिक्षण प्राप्त किया।

कार्यशाला का उद्देश्य स्पष्ट था—अपराध विवेचना के दौरान होने वाली तकनीकी त्रुटियों को कम करना और साक्ष्य संकलन की प्रक्रिया को वैज्ञानिक मानकों के अनुरूप बनाना। उद्घाटन सत्र में आईजी गर्ग ने कहा कि हत्या, हत्या के प्रयास और दुष्कर्म जैसे संवेदनशील मामलों में डीएनए साक्ष्य अब केवल सहायक नहीं, बल्कि कई बार निर्णायक भूमिका निभाते हैं। उन्होंने इस बात पर विशेष जोर दिया कि साक्ष्य संकलन के दौरान छोटी-सी चूक भी जांच को कमजोर कर सकती है, जिससे आरोपी को लाभ मिल जाता है।

कार्यशाला में क्षेत्रीय विज्ञान प्रयोगशाला, बिलासपुर की वैज्ञानिक अधिकारी डॉ. प्रियंका लकड़ा और डॉ. स्वाति कुजूर ने विषय विशेषज्ञ के रूप में विस्तार से जानकारी साझा की। डॉ. लकड़ा ने ‘फॉरेंसिक डीएनए’ पर प्रस्तुति देते हुए बताया कि मानव डीएनए का अधिकांश हिस्सा भले ही समान होता है, लेकिन शेष सूक्ष्म अंतर ही व्यक्ति की सटीक पहचान का आधार बनता है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि कई चर्चित आपराधिक मामलों में डीएनए साक्ष्य ने न केवल दोषियों को सजा दिलाने में मदद की, बल्कि निर्दोषों को भी झूठे आरोपों से मुक्त कराया है।

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि रक्त, लार, वीर्य, बाल की जड़ें, हड्डियां, दांत और यहां तक कि त्वचा की सूक्ष्म कोशिकाएं भी महत्वपूर्ण साक्ष्य हो सकती हैं। इनका सही तरीके से संग्रहण और संरक्षण जांच की सफलता की पहली शर्त है।
दूसरे सत्र में डॉ. स्वाति कुजूर ने ‘फॉरेंसिक बायोलॉजी’ के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि प्रयोगशाला में सबसे पहले नमूनों का प्रारंभिक परीक्षण कर यह सुनिश्चित किया जाता है कि वह जैविक है या नहीं। इसके बाद यह निर्धारित किया जाता है कि नमूना मानव का है या किसी अन्य जीव का। उन्होंने यह भी बताया कि फॉरेंसिक बायोलॉजी केवल डीएनए तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें मानव विज्ञान, वनस्पति विज्ञान और कीट विज्ञान जैसे विषय भी शामिल हैं, जो मृत्यु के समय और कारण का निर्धारण करने में सहायक होते हैं।
कार्यशाला के दौरान साक्ष्य संकलन से जुड़ी सावधानियों पर भी विशेष जोर दिया गया। विशेषज्ञों ने बताया कि डीएनए साक्ष्य अत्यंत संवेदनशील होते हैं और नमी, उच्च तापमान या बैक्टीरिया के संपर्क में आने से नष्ट हो सकते हैं। इसलिए इन्हें प्लास्टिक के बजाय कागज के पैकेट में सुरक्षित रखना और पूरी प्रक्रिया के दौरान ‘चेन ऑफ कस्टडी’ का पालन करना अनिवार्य है, ताकि न्यायालय में साक्ष्य की वैधता बनी रहे।
कार्यक्रम के अंत में प्रश्नोत्तर सत्र आयोजित किया गया, जिसमें उपस्थित अधिकारियों ने विवेचना के दौरान आने वाली व्यावहारिक चुनौतियों को साझा किया। विशेषज्ञों ने इन समस्याओं के समाधान भी सुझाए, जिससे प्रशिक्षण और अधिक उपयोगी साबित हुआ।
इस अवसर पर वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक मुंगेली श्री भोजराम पटेल और आईजी कार्यालय के उप पुलिस अधीक्षक श्री विवेक शर्मा भी मौजूद रहे। कार्यक्रम के सफल आयोजन के लिए आईजी गर्ग ने दोनों वैज्ञानिक अधिकारियों का आभार व्यक्त करते हुए उन्हें स्मृति चिन्ह प्रदान कर सम्मानित किया।
पुलिस महकमे के अनुसार, इस प्रशिक्षण से आने वाले समय में अपराध जांच की गुणवत्ता में सुधार होने की उम्मीद है, खासकर उन मामलों में जहां वैज्ञानिक साक्ष्य निर्णायक भूमिका निभाते हैं।
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