पेलमा रेल परियोजना में ‘कागजी खेल’ का बड़ा खुलासा: जमीन से ज्यादा मुआवजा, जिम्मेदारों पर अब तक खामोशी

Freelance editor Amardeep chauhan @ http://amarkhabar.com
रायगढ़। जिले में भू-अर्जन की प्रक्रिया एक बार फिर सवालों के घेरे में है। पेलमा-भालूमुड़ा रेल लाइन परियोजना, जिसे क्षेत्र के विकास की रीढ़ माना जा रहा है, अब कथित अनियमितताओं और ‘कागजी खेल’ के आरोपों में उलझती नजर आ रही है। हैरानी की बात यह है कि शुरुआती स्तर पर ही आपत्तियां सामने आने के बावजूद न तो गंभीर जांच हुई और न ही जिम्मेदारों पर कोई ठोस कार्रवाई।
सूत्र बताते हैं कि इस पूरी प्रक्रिया में सबसे बड़ी खामी परिसंपत्तियों के आकलन और सर्वेक्षण में सामने आई है। रेलवे की कंसल्टेंट एजेंसी इरकॉन इंटरनेशनल ने खुद पत्र लिखकर इस पर सवाल उठाए थे। 2 नवंबर 2022 को ड्रोन सर्वे के जरिए भौतिक सत्यापन कराया गया, जिसमें जिन संरचनाओं को दस्तावेजों में ‘पोल्ट्री फार्म’ बताया गया था, वे हकीकत में अस्थायी टिन शेड निकले। न बिजली कनेक्शन, न कोई स्थायी गतिविधि—यह सब सिर्फ कागजों तक सीमित था।
इसके बावजूद, राजस्व अभिलेखों में इन परिसंपत्तियों को वैध मानकर मुआवजा तय कर दिया गया। इरकॉन के अधिकारियों ने साफ तौर पर कहा कि पत्रक-10 में दर्ज कई परिसंपत्तियां वास्तविक उपयोग में नहीं थीं और केवल मुआवजा बढ़ाने के उद्देश्य से निर्माण किया गया था। इतना ही नहीं, कई मामलों में आपत्तियों के निराकरण के दौरान कंसल्टेंट एजेंसी को प्रक्रिया से बाहर रखा गया, जिससे पारदर्शिता पर और सवाल खड़े होते हैं।
सबसे चौंकाने वाला मामला चितवाही क्षेत्र का सामने आया है। यहां जिन खसरा नंबरों को प्रारंभिक राजपत्र में कृषि भूमि माना गया था, उन्हें अंतिम अवार्ड में परिवर्तित भूमि दिखाकर मुआवजा तीन गुना तक बढ़ा दिया गया। आंकड़ों पर नजर डालें तो 14.31 लाख रुपये प्रति हेक्टेयर की दर वाली जमीन को 43.20 लाख रुपये प्रति हेक्टेयर के हिसाब से आंका गया। महज 0.303 हेक्टेयर भूमि के लिए जहां मूल मूल्यांकन करीब 53 लाख रुपये था, वहीं परिसंपत्तियों का आकलन जोड़कर इसे 10 करोड़ रुपये से अधिक तक पहुंचा दिया गया—जबकि जमीन पर ऐसी कोई स्थायी संरचना मौजूद ही नहीं थी।
स्थानीय स्तर पर यह भी चर्चा है कि इस पूरे खेल में बिचौलियों की भूमिका अहम रही, जिन्होंने राजस्व अमले के साथ मिलकर कागजों में ऐसी तस्वीर बनाई, जो जमीन की हकीकत से मेल नहीं खाती। कार्रवाई के नाम पर अब तक केवल रिकॉर्ड दुरुस्त करने की कवायद होती रही, लेकिन जिन अधिकारियों की भूमिका संदिग्ध बताई जा रही है, उन पर कोई सख्त कदम नहीं उठाया गया।
पेलमा रेल लाइन परियोजना पहले भी आपत्तियों के कारण सुर्खियों में रही है, लेकिन हर बार मामला दबता चला गया। अब जबकि दस्तावेजों और भौतिक सत्यापन के बीच बड़ा अंतर उजागर हो रहा है, ऐसे में यह देखना अहम होगा कि क्या इस बार जिम्मेदारी तय होगी या फिर यह मामला भी फाइलों में ही सिमटकर रह जाएगा।
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