धूल की चादर में घुटती सांसें: रायगढ़ के डोलोमाइट खनन पर स्वास्थ्य संकट का साया, जनसुनवाई से पहले उबाल

Freelance editor Amardeep chauhan @ http://amarkhabar.com
रायगढ़ जिले से लगे सरिया, बरमकेला और चंद्रपुर अंचल में फैलते डोलोमाइट खनन को लेकर अब मामला सिर्फ विकास बनाम पर्यावरण का नहीं रह गया है—यह सीधे तौर पर लोगों की सांसों और जीवन पर असर डालने वाला संकट बनता जा रहा है। 6 और 7 अप्रैल को प्रस्तावित जनसुनवाई से ठीक पहले जिस तरह स्वास्थ्य और प्रदूषण के मुद्दे उठने लगे हैं, उसने प्रशासनिक दावों और जमीनी हकीकत के बीच गहरी खाई उजागर कर दी है।
हर सांस में घुलती धूल, बढ़ती बीमारियां
खनन और क्रशर इकाइयों के आसपास बसे गांवों से लगातार शिकायतें आ रही हैं कि हवा में घुली महीन धूल अब दैनिक जीवन का हिस्सा बन चुकी है। ग्रामीण बताते हैं कि सुबह घर के आंगन से लेकर खाने के बर्तनों तक पर धूल की परत जमी मिलती है। बच्चों और बुजुर्गों में खांसी, सांस फूलना, आंखों में जलन और त्वचा संबंधी समस्याएं आम हो चुकी हैं।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि “धीरे-धीरे यह इलाका ‘साइलेंट हेल्थ जोन’ में बदल रहा है, जहां बीमारी दिखती कम है, लेकिन फैलती ज्यादा है।”
स्वास्थ्य जांच का अभाव, आंकड़ों की चुप्पी
सबसे गंभीर सवाल यह है कि वर्षों से खनन जारी रहने के बावजूद न तो श्रमिकों के लिए नियमित स्वास्थ्य परीक्षण की कोई ठोस व्यवस्था दिखती है, और न ही आसपास के निवासियों पर पड़ रहे प्रभाव का कोई सार्वजनिक डेटा सामने आया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि डोलोमाइट की धूल लंबे समय तक सांस के जरिए शरीर में जाने पर फेफड़ों की बीमारी, एलर्जी और अन्य श्वसन संबंधी विकारों का कारण बन सकती है। लेकिन यहां न तो मेडिकल कैंप नियमित हैं और न ही किसी दीर्घकालिक अध्ययन की जानकारी उपलब्ध है।
उत्पादन बढ़ाने की होड़, जोखिम दोगुना
कटंगपाली और साल्हेओना क्षेत्र में पांच कंपनियों द्वारा उत्पादन क्षमता बढ़ाने के प्रस्ताव ने इस चिंता को और गहरा कर दिया है। अनुमान है कि प्रस्ताव स्वीकृत होने पर हर साल लगभग 5 लाख टन अतिरिक्त डोलोमाइट निकाला जाएगा—यानी धूल, ट्रैफिक और प्रदूषण का स्तर और बढ़ेगा।
7 अप्रैल को आर्यन मिनरल्स एंड मेटल्स प्राइवेट लिमिटेड की जनसुनवाई भी प्रस्तावित है, जिसमें कंपनी अपनी उत्पादन क्षमता लगभग दोगुनी करने की बात रखेगी। यह वही कंपनी है जिसे 2017 में लीज मिली थी और जिसकी वैधता 2067 तक है—यानी आने वाले दशकों तक इस क्षेत्र का पर्यावरणीय भविष्य इसी तरह के फैसलों पर निर्भर करेगा।
जनसुनवाई पर उठते सवाल: क्या सुनी जाएगी असली आवाज?
स्थानीय स्तर पर जनसुनवाई की प्रक्रिया को लेकर भी असंतोष उभर रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि सूचना का अभाव, प्रक्रिया की जटिलता और प्रशासनिक दबाव के कारण अक्सर प्रभावित लोगों की वास्तविक आवाज सामने नहीं आ पाती।
“जनसुनवाई कागजों में पूरी हो जाती है, लेकिन गांव की पीड़ा फाइलों तक नहीं पहुंचती,” एक स्थानीय निवासी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा।
राजस्व की चमक में स्वास्थ्य का अंधेरा
प्रशासनिक स्तर पर खनन से मिलने वाले राजस्व और रोजगार के अवसरों को प्रमुखता दी जा रही है, लेकिन अब सवाल उठ रहा है कि क्या यह आर्थिक लाभ लोगों की सेहत की कीमत पर हासिल किया जा रहा है?
विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यदि अभी ठोस कदम नहीं उठाए गए—जैसे धूल नियंत्रण, नियमित स्वास्थ्य जांच, पारदर्शी पर्यावरणीय डेटा और सख्त निगरानी—तो आने वाले समय में यह इलाका गंभीर स्वास्थ्य आपदा का केंद्र बन सकता है।
विकास का मॉडल या विनाश का संकेत?
रायगढ़ का यह मामला एक बड़े सवाल की ओर इशारा करता है—क्या विकास का वर्तमान मॉडल स्थानीय आबादी के स्वास्थ्य और पर्यावरण की अनदेखी कर आगे बढ़ रहा है? जनसुनवाई इस सवाल का जवाब देने का एक अवसर है, लेकिन यह तभी सार्थक होगी जब उसमें लोगों की असली आवाज सुनी जाए, न कि सिर्फ औपचारिकता निभाई जाए।
फिलहाल, इस धूल भरे माहौल में सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या यहां के लोगों को स्वच्छ हवा में सांस लेने का अधिकार मिल पाएगा, या विकास की रफ्तार उनकी सांसों पर ही भारी पड़ती रहेगी?
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