“आस्था बनाम कानून: छत्तीसगढ़ में धर्म स्वतंत्रता विधेयक पर गहराता विवाद, रायगढ़ से उठी विरोध की आवाज”

Freelance editor Amardeep chauhan @ http://amarkhabar.com
रायगढ़।
छत्तीसगढ़ की सियासत इन दिनों एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां कानून और आस्था के बीच संतुलन साधने की चुनौती खुलकर सामने आ गई है। धर्म स्वतंत्रता विधेयक-2026 के पारित होते ही प्रदेश में बहस तेज हो गई है, और रायगढ़ इस बहस का केंद्र बनकर उभरा है।
शनिवार को संयुक्त मसीही समाज ने शहर के रामलीला मैदान से शांतिपूर्ण लेकिन संगठित विरोध की शुरुआत की। प्रदर्शनकारियों ने पहले विधेयक के प्रावधानों पर विस्तार से चर्चा की और फिर रैली के रूप में कलेक्ट्रेट की ओर बढ़े। घड़ी चौक से गुजरती इस रैली में नारे गूंजते रहे—“काला कानून वापस लो” और “संविधान की रक्षा करो”—जो इस आंदोलन की भावनात्मक गहराई को दर्शाते हैं। प्रशासन ने एहतियातन पूरे मार्ग पर सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए थे।
कलेक्ट्रेट पहुंचकर प्रदर्शनकारियों ने मुख्यमंत्री और राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन सौंपा। समाज के प्रतिनिधियों का कहना था कि उनका विरोध किसी टकराव का नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक अधिकारों के तहत अपनी चिंता दर्ज कराने का प्रयास है। उनका तर्क है कि विधेयक में प्रयुक्त शब्दों की अस्पष्टता, विशेषकर “लालच” की परिभाषा, भविष्य में दुरुपयोग की आशंका को जन्म देती है। उनका मानना है कि स्वेच्छा से धर्म पालन और प्रचार संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकार है, जिसे किसी भी रूप में सीमित करना उचित नहीं ठहराया जा सकता।
धरना स्थल पर वक्ताओं ने इस विधेयक को नागरिक स्वतंत्रता के लिए संभावित खतरा बताया। उन्होंने चेताया कि यदि सरकार संशोधन पर विचार नहीं करती, तो यह मुद्दा अदालत की दहलीज तक पहुंचेगा और आंदोलन राज्यव्यापी स्वरूप ले सकता है।
वहीं दूसरी ओर, राज्य सरकार इस विधेयक को एक आवश्यक सुधार के रूप में प्रस्तुत कर रही है। गृहमंत्री विजय शर्मा द्वारा पेश इस कानून को 1968 के पुराने प्रावधानों का सख्त और आधुनिक संस्करण बताया गया है। सरकार का स्पष्ट मत है कि बल, प्रलोभन, धोखाधड़ी या भ्रामक जानकारी के जरिए होने वाले धर्मांतरण पर रोक लगाना जरूरी है, ताकि सामाजिक संतुलन और पारदर्शिता बनी रहे।
विधेयक में दंडात्मक प्रावधानों को काफी कठोर बनाया गया है। सामान्य मामलों में 7 से 10 वर्ष तक की सजा और भारी जुर्माने का प्रावधान है, जबकि महिलाओं, नाबालिगों और अनुसूचित वर्गों से जुड़े मामलों में सजा 20 वर्ष तक बढ़ाई गई है। सामूहिक धर्मांतरण के मामलों में आजीवन कारावास तक का प्रावधान इस कानून की सख्ती को दर्शाता है। इसके अलावा, धर्म परिवर्तन से पहले कलेक्टर को 60 दिन पूर्व सूचना देना, विवाह के उद्देश्य से किए गए धर्म परिवर्तन को अवैध मानना और विदेशी फंडिंग पर निगरानी जैसे प्रावधान भी इसमें शामिल हैं।
विधानसभा में इस विधेयक के पारित होने के दौरान भी राजनीतिक ध्रुवीकरण साफ दिखाई दिया। जहां सत्तापक्ष ने इसे ऐतिहासिक कदम बताया, वहीं विपक्ष ने प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए वॉकआउट कर दिया।
अब असली सवाल यह है कि क्या यह कानून वास्तव में जबरन धर्मांतरण पर अंकुश लगाने में कारगर साबित होगा, या फिर इससे सामाजिक तनाव और बढ़ेगा। फिलहाल, छत्तीसगढ़ में यह मुद्दा सिर्फ एक विधेयक नहीं, बल्कि अधिकारों, विश्वास और शासन की सीमाओं के बीच चल रही एक व्यापक बहस का रूप ले चुका है।