दान की विरासत पर दावा: तीन पीढ़ियों बाद मंदिर की जमीन पर उठे सवाल, राजस्व रिकॉर्ड भी घेरे में

Freelance editor Amardeep chauhan @ http://amarkhabar.com
रायगढ़। आस्था, परंपरा और कानून—तीनों के चौराहे पर खड़ा एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने न केवल राजस्व व्यवस्था को उलझन में डाल दिया है, बल्कि सामाजिक मान्यताओं पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। जिले के बड़े रामपुर क्षेत्र में पूर्वजों द्वारा मंदिर निर्माण के लिए दान की गई जमीन अब तीसरी पीढ़ी द्वारा वापस मांगी जा रही है। खास बात यह है कि यह जमीन वर्षों से राजस्व अभिलेखों में मंदिर ट्रस्ट के नाम दर्ज रही और उसके प्रबंधक के रूप में कलेक्टर का नाम चढ़ा हुआ है।
मामले की जड़ें उस समय से जुड़ी हैं जब अंगारमती बाई, पति बस्तीराम, ने विष्णु भगवान मंदिर के निर्माण के लिए अपनी करीब सवा एकड़ जमीन दान कर दी थी। दान के बाद राजस्व अभिलेखों में उक्त भूमि मंदिर के नाम दर्ज हो गई और प्रशासनिक व्यवस्था के तहत कलेक्टर को उसका प्रबंधक दर्शाया गया। अंगारमती के निधन के बाद भी यह स्थिति जस की तस बनी रही। उनके पुत्र—कनीराम, शनिराम, दाउराम और भुजबल—ने भी कभी इस पर आपत्ति नहीं जताई।
लेकिन अब कहानी ने नया मोड़ ले लिया है। तीसरी पीढ़ी में भुजबल के पुत्र सीताराम चौहान ने तहसील में आवेदन देकर दावा किया है कि उनके पूर्वजों ने मंदिर के लिए केवल 0.040 हेक्टेयर (लगभग 10 डिसमिल) जमीन ही दान की थी, जबकि शेष जमीन त्रुटिवश मंदिर के नाम चढ़ गई। उनका कहना है कि राजस्व अभिलेखों में हुई इस गलती को सुधारा जाना चाहिए और बाकी जमीन उनके परिवार के नाम पर वापस दर्ज की जाए।
इस पूरे मामले को और भी दिलचस्प—और विवादास्पद—बनाता है हल्का पटवारी का प्रतिवेदन। पटवारी ने अपने अभिमत में स्वीकार किया है कि संभवतः मूल दान सीमित भूमि के लिए था, लेकिन उसे खातों से पृथक न करने के कारण पूरी जमीन मंदिर के नाम दर्ज हो गई। इतना ही नहीं, उसने यह भी माना कि समय के साथ खातेदारों के नाम भी अभिलेखों से विलोपित हो गए, जो एक प्रशासनिक त्रुटि हो सकती है।
पटवारी का यह प्रतिवेदन कई बड़े सवाल खड़े करता है। क्या दशकों पुराने राजस्व अभिलेखों को इस तरह चुनौती दी जा सकती है? क्या बिना ठोस दस्तावेजी साक्ष्य के पीढ़ियों बाद दान की प्रकृति को बदला जा सकता है? और सबसे अहम—यदि दान एक धार्मिक उद्देश्य के लिए किया गया था, तो क्या उसे वापस लेने का कोई कानूनी आधार बनता है?
राजस्व और कानूनी जानकारों की मानें तो यह मामला केवल एक जमीन विवाद नहीं है, बल्कि यह उस व्यवस्था की परीक्षा भी है, जिसमें परंपरा और दस्तावेज दोनों का संतुलन जरूरी होता है। यदि पटवारी के प्रतिवेदन को आधार मान लिया जाता है, तो यह भविष्य में ऐसे कई मामलों के लिए नजीर बन सकता है, जहां पुराने दान और संपत्ति हस्तांतरण को चुनौती दी जा सकती है।
फिलहाल मामला तहसील स्तर पर विचाराधीन है, लेकिन जिस तरह से इसमें प्रशासनिक अभिलेखों, धार्मिक आस्था और पारिवारिक दावों का टकराव सामने आया है, उसे देखते हुए यह विवाद आगे और गहराने के संकेत दे रहा है। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि कानून इस जटिल विरासत को किस दिशा में ले जाता है।
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