अस्पताल की देहरी पर बुझी दो जिंदगियां: प्रसूता की तड़प, सिस्टम की खामोशी और सवालों के घेरे में स्वास्थ्य तंत्र

Freelance editor Amardeep chauhan @ http://amarkhabar.com
भानुप्रतापपुर (कांकेर)। छत्तीसगढ़ के सुदूर अंचल से सामने आई एक दर्दनाक घटना ने एक बार फिर ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था की जमीनी हकीकत को बेनकाब कर दिया है। सरकारी अस्पताल, जिसे जीवन बचाने की अंतिम उम्मीद माना जाता है, वहीं एक आदिवासी प्रसूता और उसके नवजात की मौत ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं—क्या समय पर इलाज मिलता तो ये दो जिंदगियां बच सकती थीं?
जानकारी के अनुसार, चाहचाड गांव निवासी कमलेश कोमरा अपनी गर्भवती पत्नी द्रोपदी कोमरा को 15 मई को प्रसव पीड़ा के चलते भानुप्रतापपुर के शासकीय अस्पताल लेकर पहुंचे थे। परिजनों का आरोप है कि भर्ती के बाद से ही अस्पताल में जिम्मेदार डॉक्टरों की अनुपस्थिति बनी रही। महिला करीब दो दिनों तक प्रसव पीड़ा से जूझती रही, लेकिन उसे न तो समुचित चिकित्सकीय निगरानी मिली और न ही समय पर उपचार।
स्थिति तब और गंभीर हो गई जब 17 मई को अचानक अस्पताल स्टाफ ने सोनोग्राफी कराने की सलाह दी। विडंबना यह रही कि अस्पताल की खुद की सोनोग्राफी मशीन पिछले एक वर्ष से बंद पड़ी है। इससे भी अधिक चिंताजनक तथ्य यह रहा कि मरीज को बाहर ले जाने के लिए एंबुलेंस तक उपलब्ध नहीं कराई गई। मजबूरन पति को अपनी पत्नी को मोटरसाइकिल पर बैठाकर निजी क्लीनिक ले जाना पड़ा।
परिजनों का कहना है कि सोनोग्राफी रिपोर्ट लेकर वापस लौटने के बाद भी अस्पताल में कोई डॉक्टर मौजूद नहीं था। ऑन-कॉल डॉक्टर को बार-बार सूचना देने के बावजूद उनके अस्पताल नहीं आने का आरोप भी लगाया गया है। इस बीच महिला की हालत लगातार बिगड़ती चली गई।
अंततः परिजन उसे एक निजी अस्पताल ले गए, जहां उसने बच्चे को जन्म तो दिया, लेकिन लंबे समय तक इलाज के अभाव और संक्रमण के कारण नवजात ने जन्म के एक घंटे के भीतर दम तोड़ दिया। कुछ ही घंटों बाद प्रसूता द्रोपदी ने भी जीवन की जंग हार दी।
इस घटना ने न केवल एक परिवार को उजाड़ दिया, बल्कि पूरे इलाके में आक्रोश की लहर पैदा कर दी है। मृतका की मां का कहना है कि उन्होंने डॉक्टरों को भगवान का दर्जा दिया था, लेकिन इस बार उनकी उम्मीदें टूट गईं। वहीं पति कमलेश का आरोप है कि पहले की सभी जांच रिपोर्ट सामान्य थीं और वे बेहतर इलाज की उम्मीद लेकर बड़े अस्पताल आए थे, लेकिन लापरवाही ने सब कुछ छीन लिया।
दूसरी ओर, स्वास्थ्य विभाग इस पूरे मामले में बचाव की मुद्रा में नजर आ रहा है। भानुप्रतापपुर के खंड चिकित्सा अधिकारी का कहना है कि प्रारंभिक जांच रिपोर्ट सामान्य थीं और अस्पताल की ओर से आवश्यक प्रयास किए गए। हालांकि, इस सफाई से सवाल कम नहीं हुए हैं।
यह घटना केवल एक त्रासदी नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का आईना है जहां संसाधनों की कमी, जवाबदेही का अभाव और संवेदनहीनता मिलकर जीवन के अधिकार को चुनौती दे रहे हैं। अब देखना यह होगा कि क्या इस मामले में जिम्मेदारी तय होगी या यह भी अन्य घटनाओं की तरह समय के साथ ठंडी पड़ जाएगी।
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