“जनसुनवाई की तारीख बदली, सवाल वही: पेलमा खदान पर फिर 8 जून को ‘विकास’ की परीक्षा”

Freelance editor Amardeep chauhan @ http://amarkhabar.com
रायगढ़।
SECL MDO ADANI की स्थगित हुई जनसुनवाई का कैलेंडर भले बदल गया हो, लेकिन ज़मीन पर उठ रहे सवाल अब भी जस के तस हैं। एसईसीएल की पेलमा ओपन कास्ट माइंस परियोजना के लिए अब 8 जून को जनसुनवाई तय कर दी गई है। छत्तीसगढ़ पर्यावरण संरक्षण मंडल (सीईसीबी) द्वारा घोषित इस नई तारीख के साथ एक बार फिर उस बहस को मंच मिलने जा रहा है, जो विकास और विस्थापन के बीच झूलती रही है।
करीब 2077 हेक्टेयर में प्रस्तावित इस खदान से हर साल 15 मिलियन टन कोयला निकालने का लक्ष्य रखा गया है। कागज़ों में यह आंकड़ा ऊर्जा उत्पादन और औद्योगिक विकास का प्रतीक है, लेकिन ज़मीनी हकीकत में यही परियोजना पेलमा, उरबा, मडुवाडूमर, लालपुर, हिंझर, जरी डिह, खर्रा, सक्ता और मिलूपारा जैसे गांवों के लिए अनिश्चित भविष्य की दस्तक बनकर खड़ी है।
मुआवज़े का गणित, असमानता का सवाल
प्रभावित गांवों के ग्रामीण पहले ही यह साफ कर चुके हैं कि वे विकास के विरोधी नहीं हैं, लेकिन उसकी कीमत असमान नहीं होनी चाहिए। उनकी मुख्य मांग है—सभी गांवों में एक समान मुआवजा दर लागू हो।
यह मांग केवल पैसों की नहीं, बल्कि न्याय की है। क्योंकि अक्सर देखा गया है कि एक ही परियोजना में अलग-अलग गांवों के लिए अलग-अलग दरें तय कर दी जाती हैं, जिससे असंतोष और अविश्वास दोनों पैदा होते हैं।
जनसुनवाई: औपचारिकता या असली संवाद?
जनसुनवाई को लोकतांत्रिक प्रक्रिया का अहम हिस्सा माना जाता है, लेकिन अनुभव यह भी बताते हैं कि कई बार यह महज एक औपचारिकता बनकर रह जाती है। ग्रामीणों के सवाल, आपत्तियां और आशंकाएं रिकॉर्ड में दर्ज तो होती हैं, लेकिन फैसलों पर उनका असर कितना पड़ता है—यह एक खुला सवाल है।
8 जून को होने वाली यह जनसुनवाई इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें न सिर्फ पर्यावरणीय प्रभावों पर चर्चा होगी, बल्कि लोगों के जीवन, आजीविका और भविष्य पर भी बात होगी।
जिले में ‘प्रोजेक्ट’ की लंबी कतार
पेलमा अकेला प्रोजेक्ट नहीं है। जिले में बिजारी, पोरडा-चिमटापानी, छाल, वेस्ट ऑफ बायसी और फुटहामुड़ा जैसे कई कोल ब्लॉक पहले से कतार में हैं। इसके अलावा नए स्टील प्लांट की योजनाएं भी आकार ले रही हैं।
इन सभी परियोजनाओं के लिए सैकड़ों एकड़ जंगलों की कटाई प्रस्तावित है—और यही वह बिंदु है जहां विकास और पर्यावरण के बीच टकराव सबसे ज्यादा स्पष्ट हो जाता है।
हर बार नई तारीख, पर पुरानी चिंता
जनसुनवाई की तारीखें बदलती रहती हैं, प्रोजेक्ट बढ़ते रहते हैं, और “विकास” का दायरा भी फैलता जाता है। लेकिन जिन लोगों की जमीन, जंगल और जीवन इससे सीधे प्रभावित होते हैं, उनकी चिंताएं शायद ही बदलती हैं।
हर नई तारीख के साथ उम्मीद भी जुड़ती है और संशय भी—क्या इस बार उनकी बात सुनी जाएगी, या फिर यह भी एक और औपचारिक प्रक्रिया बनकर रह जाएगी?
8 जून सिर्फ तारीख नहीं, एक कसौटी
पेलमा माइंस की जनसुनवाई अब सिर्फ एक प्रशासनिक कार्यक्रम नहीं रह गई है, बल्कि यह उस भरोसे की परीक्षा बन चुकी है, जो आम लोग व्यवस्था से रखते हैं।
अब नजरें 8 जून पर टिकी हैं—जहां तय होगा कि विकास का रास्ता संवाद से होकर गुजरेगा या फिर वही पुराना रास्ता अपनाया जाएगा, जहां फैसले पहले होते हैं और सुनवाई बाद में।
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