छत्तीसगढ़ के कोल ब्लॉक्स पर ‘ब्रेक’: भू-अर्जन की जटिलता से अटकी नीलामी, रायगढ़ के 5 बड़े प्रोजेक्ट भी ठंडे बस्ते में

रायगढ़।
छत्तीसगढ़ के कोयला क्षेत्र में पिछले कुछ वर्षों से जो अदृश्य संकट पनप रहा था, अब वह खुलकर सामने आने लगा है। राज्य के कई कोल ब्लॉक्स के विकास में आ रही गंभीर प्रशासनिक और सामाजिक अड़चनों के चलते कोल ब्लॉक्स की नीलामी प्रक्रिया पर ही विराम लग गया है।
केंद्रीय एजेंसी एमएसटीसी द्वारा संचालित कमर्शियल कोल ब्लॉक्स की 14वें दौर की नीलामी में छत्तीसगढ़ की खदानों को फिलहाल रोक दिया गया है। खास बात यह है कि इस सूची में रायगढ़ जिले की पांच महत्वपूर्ण खदानें भी शामिल थीं, जिन पर अब बोली लगने की संभावना फिलहाल टल गई है।
सूत्रों के मुताबिक, देश की कई बड़ी कंपनियों ने केंद्र सरकार को फीडबैक दिया है कि छत्तीसगढ़ में कोल ब्लॉक्स डेवलप करना पिछले दो-तीन सालों में बेहद जटिल और जोखिमभरा हो गया है, खासकर निजी जमीन के अधिग्रहण और स्थानीय विरोध के कारण।
जमीन अधिग्रहण बना सबसे बड़ी बाधा
कोयला परियोजनाओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती अब भू-अर्जन (Land Acquisition) बनकर उभरी है।
रायगढ़ जिले में हाल के महीनों में दो कोल परियोजनाओं को लेकर हुए विरोध ने कंपनियों की चिंता और बढ़ा दी है। पुरुंगा और गारे-पेलमा सेक्टर-1 से प्रभावित गांवों के ग्रामीणों ने खुले तौर पर अपनी जमीन देने से इनकार कर दिया है।
स्थिति इतनी तनावपूर्ण हो गई कि जनसुनवाई के दौरान कानून-व्यवस्था की स्थिति बनने लगी। इसके बाद प्रशासन को आगे होने वाली जनसुनवाई भी टालनी पड़ी।
खनन क्षेत्र से जुड़े जानकारों का कहना है कि
> “जब तक जमीन अधिग्रहण और सामाजिक स्वीकृति का रास्ता साफ नहीं होगा, तब तक कोई भी बड़ी कंपनी निवेश का जोखिम नहीं लेना चाहती।”
कंपनियों ने सरकार को दिया स्पष्ट संदेश
कमर्शियल माइनिंग में रुचि दिखाने वाली कई कंपनियों ने सरकार को स्पष्ट संकेत दिया है कि छत्तीसगढ़ में परियोजनाओं को जमीन पर उतारना अब आसान नहीं रहा।
कंपनियों का कहना है कि परियोजना मिलने के बाद भी
भूमि अधिग्रहण में लंबा समय लग रहा है
पर्यावरण और वन स्वीकृतियों की प्रक्रिया जटिल है
स्थानीय विरोध के कारण जनसुनवाई पूरी नहीं हो पा रही
इन्हीं कारणों से कंपनियों ने नई नीलामी में बोली लगाने से दूरी बनानी शुरू कर दी है।
रायगढ़ के कोल सेक्टर पर असर
रायगढ़ जिला लंबे समय से छत्तीसगढ़ के कोयला उद्योग का प्रमुख केंद्र माना जाता है। यहां पहले से कई बड़े कोल प्रोजेक्ट संचालित हैं और कई नए ब्लॉक्स के विकास की योजना थी।
लेकिन अब हालात यह हैं कि
नई परियोजनाओं की जनसुनवाई टल रही है
कंपनियां बोली लगाने में हिचकिचा रही हैं
केंद्र की नीलामी प्रक्रिया भी अस्थायी रूप से रोक दी गई है
इसका सीधा असर आने वाले समय में खनन निवेश, रोजगार और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।
विकास बनाम जमीन का संघर्ष
कोयला परियोजनाओं के साथ अक्सर विकास और जमीन के अधिकार का टकराव भी सामने आता है।
ग्रामीणों की चिंता है कि
जमीन जाने के बाद स्थायी रोजगार की गारंटी नहीं होती
विस्थापन और पर्यावरणीय प्रभाव बढ़ते हैं
मुआवजा और पुनर्वास की प्रक्रिया लंबी और जटिल होती है
इसी वजह से कई गांवों में अब लोग पहले की तुलना में अधिक संगठित होकर विरोध दर्ज करा रहे हैं।
आगे क्या होगा?
कोल मंत्रालय और राज्य सरकार के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती यह है कि
भू-अर्जन की प्रक्रिया को पारदर्शी और स्वीकार्य बनाया जाए
प्रभावित गांवों के साथ भरोसे का माहौल तैयार किया जाए
पुनर्वास और रोजगार की ठोस व्यवस्था सुनिश्चित की जाए
यदि ऐसा नहीं हुआ तो आशंका है कि छत्तीसगढ़ के कई कोल ब्लॉक्स लंबे समय तक कागजों में ही अटके रह सकते हैं।
एक्सप्लेनर बॉक्स : छत्तीसगढ़ की कोयला खदानों पर क्या है पूरा मामला
नीलामी राउंड : 14वां कमर्शियल कोल ब्लॉक ऑक्शन
छत्तीसगढ़ की कुल खदानें शामिल : 14
रायगढ़ जिले की खदानें : 5
नीलामी एजेंसी : MSTC (केंद्र सरकार की ई-ऑक्शन एजेंसी)
प्रमुख कारण जिनसे नीलामी रुकी
• निजी जमीन का अधिग्रहण बेहद कठिन
• स्थानीय ग्रामीणों का विरोध बढ़ना
• जनसुनवाई प्रक्रिया पूरी नहीं हो पाना
• पर्यावरण और वन स्वीकृति में देरी
• कंपनियों की निवेश को लेकर हिचकिचाहट
रायगढ़ में विवाद वाले प्रमुख प्रोजेक्ट
• पुरुंगा कोल ब्लॉक
• गारे-पेलमा सेक्टर-1
इन दोनों परियोजनाओं की जनसुनवाई में भारी विरोध के कारण प्रशासन को प्रक्रिया रोकनी पड़ी।
कंपनियों का फीडबैक
खनन कंपनियों ने केंद्र सरकार को बताया कि
परियोजना मिलने के बाद भी जमीन अधिग्रहण में वर्षों लग रहे हैं
सामाजिक विरोध के कारण काम शुरू करना मुश्किल हो रहा है
ग्राउंड एनालिसिस : कोयला, जमीन और बदलता ग्रामीण मनोविज्ञान
छत्तीसगढ़ के कोयला क्षेत्र में जो स्थिति बन रही है, वह केवल प्रशासनिक समस्या नहीं बल्कि ग्रामीण समाज के बदलते नजरिये का संकेत भी है।
करीब एक दशक पहले तक कोयला परियोजनाओं के लिए जमीन अधिग्रहण अपेक्षाकृत आसान माना जाता था। लेकिन अब ग्रामीणों का दृष्टिकोण तेजी से बदला है।
रायगढ़, धरमजयगढ़ और तमनार क्षेत्र में पहले से चल रही कई खदानों के अनुभव ने आसपास के गांवों को सतर्क बना दिया है। कई जगहों पर ग्रामीणों का कहना है कि जमीन देने के बाद स्थायी रोजगार और पुनर्वास के वादे पूरी तरह पूरे नहीं हुए। यही कारण है कि नई परियोजनाओं के प्रति संदेह बढ़ रहा है।
दूसरी ओर कंपनियों की चिंता अलग है। उनके मुताबिक परियोजना मिलने के बाद भूमि अधिग्रहण, पर्यावरणीय मंजूरी और सामाजिक सहमति की प्रक्रिया इतनी लंबी हो जाती है कि निवेश की लागत और जोखिम दोनों बढ़ जाते हैं।
इसी द्वंद्व का परिणाम अब नीलामी प्रक्रिया पर भी दिखने लगा है। जब कंपनियों को जमीन पर परियोजना शुरू होने का भरोसा नहीं होता, तो वे बोली लगाने से भी पीछे हटने लगती हैं।
विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर राज्य सरकार और केंद्र भू-अर्जन, पुनर्वास और स्थानीय रोजगार की स्पष्ट नीति नहीं बनाएंगे तो आने वाले वर्षों में छत्तीसगढ़ के कई कोल ब्लॉक्स कागजों में ही अटके रह सकते हैं।
दूसरी तरफ यह भी सच है कि कोयला उद्योग छत्तीसगढ़ की अर्थव्यवस्था का बड़ा आधार है। ऐसे में सरकार के सामने चुनौती यह है कि खनन विकास और स्थानीय अधिकारों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।