“16 करोड़ की जिंदगी, रंगों में मुस्कान: स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी से जंग जीतकर छायंक नायक ने खेली होली”

Freelance editor Amardeep chauhan @ http://amarkhabar.com
होली के रंग इस बार छायंक नायक के आंगन में कुछ अलग ही चमक रहे थे। यह सिर्फ रंगों का त्योहार नहीं था, बल्कि एक लंबी और कठिन लड़ाई के बाद मिली जिंदगी का उत्सव था। कभी अस्पताल के बेड पर मशीनों और दवाओं के सहारे सांस लेने वाला यह नन्हा बालक अब अपने हाथों से गुलाल उड़ा रहा है।
छायंक स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी (SMA) टाइप-1 जैसी गंभीर और दुर्लभ बीमारी से जूझ रहा था। यह ऐसी आनुवांशिक बीमारी है, जिसमें शरीर की मांसपेशियां धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगती हैं और समय रहते इलाज न मिले तो जीवन पर संकट मंडरा जाता है। परिवार के लिए यह खबर किसी वज्रपात से कम नहीं थी। डॉक्टरों ने साफ कहा था—एक विशेष इंजेक्शन ही उम्मीद है, जिसकी कीमत करीब 16 करोड़ रुपये है।
राशि इतनी बड़ी थी कि आम आदमी के लिए कल्पना करना भी मुश्किल। लेकिन मां-बाप के हौसले और समाज की संवेदनशीलता ने असंभव को संभव कर दिखाया। सोशल मीडिया से लेकर जनप्रतिनिधियों और सामाजिक संगठनों तक मदद की अपील पहुंची। धीरे-धीरे लोगों ने अपनी सामर्थ्य के अनुसार योगदान दिया और आखिरकार वह दिन आया, जब छायंक को जीवनदान देने वाला इंजेक्शन लगाया गया।
इलाज के बाद धीरे-धीरे सुधार दिखने लगा। जिस बच्चे की सांसें कभी डगमगा रही थीं, वह अब खिलखिलाकर हंस रहा है। इस होली पर जब उसने पहली बार अपने हाथों से रंग उठाया, तो परिवार की आंखें नम हो गईं। यह सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि उम्मीद की वापसी थी।
छायंक के पिता कहते हैं, “हमने कभी सोचा नहीं था कि इतनी बड़ी रकम जुटा पाएंगे। लेकिन लोगों ने जिस तरह साथ दिया, वह जीवनभर नहीं भूलेंगे।” मां की आंखों में संतोष है—“अब हर त्योहार हमें नई सुबह जैसा लगता है।”
होली के इस अवसर पर मोहल्ले के लोग भी विशेष रूप से छायंक के घर पहुंचे। रंगों के बीच यह एहसास साफ था कि यह उत्सव सिर्फ परंपरा नहीं, बल्कि एक बच्चे की नई जिंदगी का जश्न है।
छायंक की कहानी बताती है कि संवेदनाएं और सामूहिक प्रयास मिल जाएं तो असंभव भी संभव हो सकता है। 16 करोड़ के उस इंजेक्शन ने सिर्फ एक शरीर को ताकत नहीं दी, बल्कि पूरे समाज को यह भरोसा दिलाया कि उम्मीद का रंग कभी फीका नहीं पड़ता।