सवाल पूछने पर खामोशी, सम्मान पर तत्परता: सराईपाली स्कूल मामले में प्रशासन की चुप्पी क्या बहुत कुछ कह रही है?

Freelance editor Amardeep chauhan @ http://amarkhabar.com
रायगढ़ | सराईपाली शासकीय माध्यमिक शाला में पढ़ाई ठप होने के आरोपों के बीच एक शिक्षक को गणतंत्र दिवस पर सम्मानित किया जाना अब सिर्फ विवाद नहीं, बल्कि प्रशासनिक चुप्पी का प्रतीक बनता जा रहा है।
चौंकाने वाली बात यह है कि इस पूरे प्रकरण पर न तो शिक्षा विभाग का कोई आधिकारिक बयान सामने आया है, न ही जिला प्रशासन ने अब तक एक पंक्ति का स्पष्टीकरण देना जरूरी समझा।
सम्मान देने में तेजी, सवालों पर मौन
जिस शिक्षक की विद्यालय उपस्थिति को लेकर ग्रामीणों और अभिभावकों ने शिकायतें कीं, उसी शिक्षक को मास्टर ट्रेनर के रूप में सम्मानित किया गया।
सम्मान समारोह तो पूरे वैभव के साथ हो गया, लेकिन उसके बाद उठे सवालों पर प्रशासन की ओर से पूर्ण चुप्पी छाई हुई है।
यह चुप्पी कई आशंकाओं को जन्म देती है—
क्या प्रशासन के पास इन सवालों के जवाब नहीं हैं?
या फिर जवाब हैं, लेकिन देना असुविधाजनक है?
ना जांच की जानकारी, ना खंडन
अब तक यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि—
क्या शिक्षक की वास्तविक विद्यालय उपस्थिति का कोई सत्यापन किया गया?
क्या सराईपाली स्कूल की शैक्षणिक स्थिति की रिपोर्ट मंगाई गई?
क्या ग्रामीणों की शिकायतों पर कोई विभागीय जांच हुई?
सबसे अहम बात—
यदि आरोप गलत हैं, तो प्रशासन उन्हें सार्वजनिक रूप से खंडित क्यों नहीं कर रहा?
और यदि आरोप सही हैं, तो फिर सम्मान देने का निर्णय किस आधार पर लिया गया?
चुप्पी क्या स्वीकारोक्ति है?
प्रशासनिक मामलों में अक्सर कहा जाता है कि मौन भी एक उत्तर होता है।
सराईपाली प्रकरण में यही मौन अब संदेह को और गहरा कर रहा है।
शिक्षा से जुड़े मुद्दों पर यदि प्रशासन चुप रहे, तो यह संदेश जाता है कि—
छात्रों की पढ़ाई प्राथमिकता नहीं है
मंच और प्रमाण पत्र ज्यादा महत्वपूर्ण हैं
शिकायतें करना व्यर्थ है
बच्चे इंतज़ार में, अधिकारी मौन में
सराईपाली स्कूल के छात्र आज भी नियमित कक्षाओं का इंतज़ार कर रहे हैं।
वहीं जिला और शिक्षा विभाग के अधिकारी अब तक इस सवाल पर मौन हैं कि पढ़ाई ठप होने की जिम्मेदारी आखिर किसकी है?
यह मौन—
न छात्रों के भविष्य के पक्ष में है
न शिक्षा व्यवस्था की साख के
और न ही प्रशासनिक पारदर्शिता के
अब भी समय है जवाब देने का
यह खबर किसी व्यक्ति को कटघरे में खड़ा करने का प्रयास नहीं, बल्कि प्रशासन को जवाबदेह बनाने की आखिरी कोशिश है।
यदि जल्द ही—
तथ्य सामने नहीं रखे गए
जांच की घोषणा नहीं हुई
या स्पष्टीकरण जारी नहीं किया गया
तो यह मान लिया जाएगा कि प्रशासन ने सवालों से मुंह मोड़ लिया है।
और तब यह मामला एक शिक्षक का नहीं, बल्कि उस सिस्टम का उदाहरण बन जाएगा,
जहां चुप्पी ही सबसे बड़ा जवाब होती है।