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चार गांवों पर मंडराता विस्थापन का साया, पर अब तक साफ़ नहीं कौन-सी बस्तियां हटेंगी

फ्रीलांस एडिटर अमरदीप चौहान/अमरखबर.कॉम रायगढ़।
रायगढ़ जिले को हवाई नक्शे पर लाने का सपना एक बार फिर चर्चा में है। प्रस्तावित एयरपोर्ट परियोजना को लेकर प्रशासनिक हलकों में हलचल जरूर है, लेकिन ज़मीनी सच्चाई यह है कि जिन गांवों और बस्तियों पर इसका सीधा असर पड़ेगा, उनके भविष्य को लेकर अब तक कोई स्पष्ट तस्वीर सामने नहीं आई है। सवाल सीधा है—कौन-कौन से गांव खाली होंगे और किन बस्तियों को हटाया जाएगा? जवाब अब भी गोल-मोल है।

सरकारी दस्तावेजों और प्रारंभिक सर्वे के अनुसार पुसौर तहसील के कोंड़ातराई, औरदा, बेलपाली और जकेला—इन चार गांवों की कुल 227 हेक्टेयर भूमि एयरपोर्ट के लिए चयनित की गई है। इसके अतिरिक्त रनवे और तकनीकी जरूरतों के लिए करीब 23 एकड़ अतिरिक्त भूमि भी अधिग्रहित की जानी है। यहीं से विस्थापन का असली संकट शुरू होता है।

गांव तय, पर बस्तियां अब भी “अनक्लियर”

अभी तक प्रशासन ने यह सार्वजनिक नहीं किया है कि इन गांवों की कौन-कौन सी बस्तियां पूरी तरह हटाई जाएंगी और किन हिस्सों को आंशिक रूप से प्रभावित माना जा रहा है। सूत्रों के अनुसार—

कोंड़ातराई में प्रस्तावित एयरस्ट्रिप और उससे जुड़े सुरक्षा क्षेत्र के दायरे में आने वाली आबादी वाली पट्टियों पर सबसे अधिक खतरा है।

औरदा और बेलपाली में खेती के साथ-साथ अब पक्के मकानों की संख्या बढ़ चुकी है, जिससे यहां पूर्ण या आंशिक विस्थापन की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

जकेला में भूमि का रकबा सबसे अधिक है, लेकिन यहां भी कुछ घनी बस्तियां रनवे एप्रोच ज़ोन में बताई जा रही हैं।


हालांकि, इन संभावनाओं पर न तो जिला प्रशासन ने कोई सूची जारी की है और न ही राजस्व विभाग ने प्रभावित बस्तियों का नक्शा सार्वजनिक किया है।

पक्के मकान, बड़ा मुआवजा और पुनर्वास की जटिलता

बीते एक दशक में जिन जमीनों को 2012 में एयरपोर्ट के लिए चिन्हित किया गया था, वहां अब हालात पूरी तरह बदल चुके हैं।
जहां कभी खाली खेत थे, वहां आज—

पक्के मकान खड़े हैं

सिंचाई की सुविधाएं विकसित हो चुकी हैं

बाजार मूल्य कई गुना बढ़ चुका है


ऐसे में यदि पूरी बस्तियां हटती हैं, तो केवल मुआवजा ही नहीं बल्कि पुनर्वास के लिए जमीन, आधारभूत सुविधाएं और सामाजिक सहमति जुटाना प्रशासन के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी।

भूमाफिया सक्रिय, ग्रामीण असमंजस में

एयरपोर्ट की आहट के साथ ही संभावित क्षेत्र में भूमाफिया की सक्रियता भी तेज हो गई है। जमीनों की खरीद-फरोख्त और भाव बढ़ने से असली नुकसान उन ग्रामीणों को हो सकता है, जिनकी जमीन या मकान अधिग्रहण की जद में आएंगे, लेकिन उन्हें समय पर सही जानकारी नहीं दी जा रही।

उपलब्धि बड़ी, पर पारदर्शिता जरूरी

इसमें कोई संदेह नहीं कि एनटीपीसी, जिंदल, अडाणी, हिंडाल्को, एसईसीएल जैसे बड़े औद्योगिक समूहों वाले जिले के लिए एयरपोर्ट एक ऐतिहासिक उपलब्धि होगी। लेकिन उतना ही सच यह भी है कि—

> जब तक यह साफ़ नहीं किया जाता कि कौन-सी बस्ती हटेगी, कौन-सा गांव खाली होगा और किसे कहां बसाया जाएगा, तब तक यह परियोजना डर और अविश्वास के साये में ही रहेगी।



अब जरूरत इस बात की है कि प्रशासन प्रभावित बस्तियों और गांवों की स्पष्ट सूची, संभावित पुनर्वास योजना और मुआवजा नीति को सार्वजनिक करे—ताकि विकास की उड़ान, लोगों की ज़मीन और घरों को रौंदते हुए न भरे।

समाचार सहयोगी सिकंदर आर चौहान

Amar Chouhan

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