विकास का भूत—विकास या विनाश?

प्रकृति की गोद से बाज़ार की गिरफ्त तक—आदिवासी जीवन की एक मौन मृत्यु-यात्रा
कभी ‘आदिवासी गाँव’ कहते ही आँखों के सामने पहाड़ों की हरी छाती, पर्वतों की नीली छाया, झरनों की कल-कल ध्वनि, जंगल की मादक सुगंध और मिट्टी के घर के द्वार पर जलते चूल्हे का धुआँ तैर उठता था। वहाँ जीवन सरल था, लेकिन निर्जीव नहीं; गरीबी हो सकती थी, लेकिन मन में गुलामी नहीं थी।
उस जीवन की सुबह सूर्योदय से पहले ही शुरू हो जाती थी। पहाड़ की छाती चीरकर निकलने वाले झरने के शीतल जल में स्नान, पेड़ की टहनी से दाँत साफ करना, गोबर से घर-आँगन लीपना और मिट्टी के चूल्हे के धुएँ के साथ दिन का पहला गीत—यही उनके जीवन का सहज संगीत था।
आदिवासी बच्चे के लिए जंगल ही पाठशाला था। पहाड़ शिक्षक था। नदी जीवन का पाठ पढ़ाती थी। पशु-पक्षी उसके सहपाठी थे। प्रकृति उसे किताब के पन्नों पर नहीं, बल्कि जीवन के पन्नों पर ज्ञान सिखाती थी।
चींटी अपना घर कैसे बनाती है, पक्षी ऋतु को कैसे पहचानते हैं, पेड़ औषधि कैसे बनता है, जंगली जानवरों से स्वयं को कैसे सुरक्षित रखना है—ये सब उनके जीवन का जीवंत पाठ्यक्रम था।
उनके जीवन में बाज़ार था, लेकिन बाज़ार उनके जीवन का मालिक नहीं था।
साप्ताहिक हाट उनका सबसे बड़ा बाज़ार था। जंगल से जुटाए फल-मूल, शहद, अनाज, मंडिया, दाल तथा अपने हाथों से बनाए बाँस के कुला, डुली और अन्य सामान लेकर वे हाट जाते थे। बेचते थे और बदले में आवश्यकता की वस्तुएँ लाते थे। अर्थव्यवस्था थी, लेकिन लालच की अर्थव्यवस्था नहीं थी।
पूरे वर्ष की मेहनत से पैदा किया गया अनाज पहले घर की भूख मिटाता था; फिर पड़ोसी, मित्र और रिश्तेदारों के घर पहुँचता था। अनाज के भीतर संबंध थे, अन्न के भीतर आत्मीयता थी।
मिट्टी, पानी, जंगल, पहाड़ और वृक्ष उनके लिए केवल संसाधन नहीं थे; वे जीवन के देवता थे। पेड़ काटने से पहले मन काँप उठता था, नदी को प्रदूषित करने से पहले विवेक प्रश्न करता था। प्रकृति को जीतना नहीं, प्रकृति के साथ मिलकर जीना ही उनका दर्शन था।
उनके गीतों में नदी थी, पहाड़ था, जंगल था और मिट्टी थी। उनके नृत्य में ऋतुओं की लय थी। उनके पर्वों में पूरे समुदाय का आनंद था। वह नृत्य किसी की प्रशंसा पाने के लिए नहीं था; वह हृदय में जागे आनंद को और गहरा करने के लिए था।
गाँव की सबसे बड़ी संसद थी—ग्रामसभा। घर बनाने से लेकर खेती तक, जल संरक्षण से लेकर सामूहिक कार्यों तक—हर निर्णय मिल-जुलकर लिया जाता था। एक घर का दुःख पूरे गाँव का दुःख था और एक घर की खुशी पूरे गाँव की खुशी।
गाँव के वैद्य के हाथों में जंगल का सदियों पुराना औषधीय ज्ञान था। पेड़ों की जड़, छाल, पत्तियों और फूलों में वह उपचार खोज लेता था। यह ज्ञान किसी विश्वविद्यालय की डिग्री में दर्ज नहीं था; फिर भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवन की परीक्षा में तपकर वह ज्ञान परिपक्व हुआ था।
फिर एक दिन आया एक नया शब्द—‘विकास’।
शुरुआत में यह शब्द बहुत मधुर लगा। सड़क आएगी, बिजली आएगी, स्कूल आएगा, अस्पताल आएगा, रोजगार आएगा—ऐसे सपने दिखाए गए।
लेकिन उसी विकास के पीछे-पीछे एक और अदृश्य अतिथि आया—बाज़ार।
बाज़ार आया और धीरे-धीरे जीवन के हर कोने पर अपना अधिकार जमाने लगा।
उसने दातून को कहा—पुराना; ब्रश को कहा—आधुनिक। मंडिया के पेय को कहा—गरीबों का भोजन; बाज़ार के भोजन को कहा—आधुनिक जीवन। मिट्टी के घर को कहा—पिछड़ापन; सीमेंट और टाइल्स को कहा—प्रगति। बाँस को पीछे धकेलकर प्लास्टिक को आगे कर दिया। बैलगाड़ी को हटाकर मशीनों को ला दिया।
और इस परिवर्तन में एक अजीब घटना घट गई—
जीवन आसान हुआ, लेकिन मनुष्य असहाय होने लगा।
बाज़ार बड़ा हुआ, लेकिन मनुष्य की स्वतंत्रता छोटी होती गई।
घर चमकदार हुए, लेकिन जीवन की आत्मीयता धुंधली पड़ गई।
सुविधाएँ बढ़ीं, लेकिन आत्मनिर्भरता घटती गई।
कल जो बच्चा जंगल को अपना घर समझता था, आज वह मोबाइल की स्क्रीन पर दुनिया खोज रहा है। जिन हाथों से कभी बाँस की टोकरी बनाई जाती थी, उन्हीं हाथों में आज बाज़ार से खरीदा हुआ प्लास्टिक है। जिस मिट्टी ने कभी उन्हें अन्न दिया था, वही मिट्टी आज रासायनिक खेती का बोझ ढो रही है।
परिवर्तन को रोकना उद्देश्य नहीं है; लेकिन प्रश्न यह है—परिवर्तन की दिशा कौन तय कर रहा है?
यदि आदिवासियों को विकास देने के नाम पर उनके जंगल छीन लिए जाएँ, उन्हें जमीन से अलग कर दिया जाए, उनके पारंपरिक ज्ञान को तुच्छ समझा जाए और उनके भोजन की आत्मनिर्भरता समाप्त करके बाज़ार के भोजन पर निर्भर बना दिया जाए—तो उसे किस मुँह से ‘विकास’ कहा जाएगा?
क्या विकास केवल सड़क, इमारत, मशीन और बाज़ार का नाम है?
या विकास का अर्थ यह है कि मनुष्य अपनी मिट्टी से जुड़ा रहे, प्रकृति सुरक्षित रहे, भोजन सुरक्षित रहे, संस्कृति जीवित रहे, गाँव आत्मनिर्भर बने और मनुष्य के सिर के ऊपर का आकाश उसका अपना बना रहे?
आदिवासियों को शहर की नकल सिखाने से पहले हमें उनसे एक बात सीखनी होगी—प्रकृति के साथ जीना कैसे होता है।
उन्हें आधुनिक शिक्षा दीजिए, लेकिन उनके जीवन-ज्ञान को अज्ञान मत कहिए।
उन्हें आधुनिक चिकित्सा दीजिए, लेकिन उनके पारंपरिक औषधीय ज्ञान को मिट्टी में मत मिला दीजिए।
उन्हें तकनीक दीजिए, लेकिन प्रकृति से दूर मत कीजिए।
उन्हें सड़क दीजिए, लेकिन उनके जंगल मत छीनिए।
उन्हें बाज़ार दीजिए, लेकिन उन्हें केवल बाज़ार का ग्राहक मत बना दीजिए।
क्योंकि जो समाज अपने भोजन, अपने घर, अपनी औषधि, अपने ज्ञान और अपनी संस्कृति के लिए पूरी तरह बाज़ार पर निर्भर हो जाता है, वह समाज बाहर से भले ही आधुनिक दिखाई दे; लेकिन भीतर से धीरे-धीरे अपनी स्वतंत्रता खो देता है।
आज आवश्यकता आदिवासियों को बदलने की नहीं, बल्कि विकास की परिभाषा बदलने की है।
जिस विकास में जंगल मर जाएँ, नदियाँ सूख जाएँ, मिट्टी विषैली हो जाए, परंपराएँ मर जाएँ और मनुष्य बाज़ार का गुलाम बन जाए—वह विकास नहीं है।
वह विनाश का चमकदार मुखौटा है।
और जिस विकास में मनुष्य आगे बढ़े, लेकिन उसके साथ जंगल भी बचे; सड़क बने, लेकिन नदी भी बचे; घर पक्का हो, लेकिन मिट्टी से रिश्ता न मरे; शिक्षा आए, लेकिन परंपरा नष्ट न हो; बाज़ार आए, लेकिन आत्मनिर्भरता न मरे—
वही वास्तविक विकास है।
अन्यथा आने वाली पीढ़ी हमसे पूछेगी—
“तुमने हमें विकास दिया था,
या हमारे जंगल छीनकर हमें बाज़ार दे दिया था?”
“तुमने हमें समृद्ध बनाया था,
या हमें निर्भर बना दिया था?”
“तुम हमें आगे ले गए थे,
या हमारी जड़ों को ही काट दिया था?”
इन प्रश्नों के उत्तर हमें आज ही खोजने होंगे।
क्योंकि—
विकास का भूत यदि मनुष्य को प्रकृति से अलग कर दे, तो वह विकास नहीं—विनाश है।
प्रकृति को बचाकर, संस्कृति का सम्मान करके और आत्मनिर्भरता को मजबूत बनाते हुए मनुष्य को आगे ले जाना—यही वास्तविक विकास है।
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