“रायगढ़ में ‘भूमि खेल’ का बड़ा खुलासा: प्रतिबंध के बाद भी रजिस्ट्रियां, मुआवजा बढ़ाने की सुनियोजित पटकथा?”

Freelance editor Amardeep chauhan @ http://amarkhabar.com
रायगढ़, 15 मई 2026।
खनिज और औद्योगिक परियोजनाओं के लिए चर्चित रायगढ़ एक बार फिर जमीन से जुड़े गंभीर सवालों के केंद्र में है। तमनार क्षेत्र के गारे-पेलमा सेक्टर-2 से जुड़े महाजेंको कोल ब्लॉक में कथित तौर पर सैकड़ों करोड़ रुपये के भू-अर्जन घोटाले के संकेत सामने आए हैं। आरोप है कि परियोजना प्रभावित क्षेत्र में भूमि अधिग्रहण से पहले ही जमीनों की खरीद-फरोख्त, नामांतरण और डायवर्सन के जरिए मुआवजा बढ़ाने का सुनियोजित खेल खेला गया।
प्रतिबंध के बावजूद रजिस्ट्रियों का सिलसिला
प्रशासनिक रिकॉर्ड के मुताबिक, फरवरी 2021 में तत्कालीन कलेक्टर ने स्पष्ट आदेश जारी कर संबंधित क्षेत्रों में जमीन की खरीद-बिक्री, नामांतरण और डायवर्सन पर रोक लगा दी थी। उप-पंजीयक को भी रजिस्ट्रियां नहीं करने के निर्देश दिए गए थे।
लेकिन सवाल यहीं से शुरू होता है—जब प्रतिबंध लागू था, तो उसी अवधि में सबसे अधिक रजिस्ट्रियां कैसे हुईं?
सूत्रों के अनुसार, एक ही खसरा नंबर की जमीन को कई हिस्सों में बांटकर अलग-अलग नामों पर रजिस्ट्री कराई गई। इससे न केवल कानूनी प्रक्रिया को दरकिनार किया गया, बल्कि संभावित मुआवजे की राशि को कई गुना बढ़ाने की जमीन भी तैयार कर ली गई।
नामांतरण और डायवर्सन: ‘सिस्टम’ की मिलीभगत?
मामला सिर्फ रजिस्ट्री तक सीमित नहीं रहा। नामांतरण और डायवर्सन की प्रक्रिया भी तेजी से आगे बढ़ाई गई। कृषि भूमि को आवासीय और व्यावसायिक श्रेणी में परिवर्तित कर दिया गया—वह भी उस समय, जब प्रतिबंधात्मक आदेश प्रभावी थे।
दस्तावेजों की समीक्षा से यह संकेत मिलता है कि कुछ मामलों में आदेशों की अनदेखी कर डायवर्सन की अनुमति दी गई। इससे जमीनों का बाजार मूल्य बढ़ा और अधिग्रहण के समय अधिक मुआवजे का रास्ता खुला।
सर्वे में देरी, निर्माण को मिला समय
प्रशासन ने जुलाई 2021 में सर्वे का आदेश दिया, जबकि प्रतिबंध फरवरी में ही लागू हो चुका था। इसके बाद भी वास्तविक सर्वे प्रक्रिया नवंबर तक खिंचती रही।
इस देरी ने कथित तौर पर कई लोगों को मौका दिया कि वे जमीन पर निर्माण कार्य कर सकें। अब स्थिति यह है कि जिन खेतों में फसल होनी चाहिए थी, वहां पक्के निर्माण खड़े दिखाई दे रहे हैं।
बाहरी खरीदारों की सक्रियता
रोड़ोपाली और मुड़ागांव जैसे गांवों में बाहरी लोगों द्वारा बड़ी संख्या में जमीन खरीदने और बाद में निर्माण कराने की बात सामने आई है। इससे स्थानीय किसानों और जमीन मालिकों के बीच असंतोष बढ़ा है।
आरोप है कि कुछ अधिकारियों और कर्मचारियों की मिलीभगत से यह पूरा तंत्र संचालित हुआ, जिसमें नामांतरण को एक तरह के “उद्योग” की तरह चलाया गया।
मुआवजा नीति पर भी सवाल
इस पूरे प्रकरण का सबसे संवेदनशील पहलू यह है कि यदि जमीनें पहले से ही बाहरी लोगों के नाम पर स्थानांतरित हो चुकी हैं, तो अधिग्रहण के समय मुआवजा और पुनर्वास का लाभ असली भूमिधारकों के बजाय नए खरीदारों को मिल सकता है।
यह स्थिति न केवल सामाजिक असंतुलन पैदा करेगी, बल्कि भूमि अधिग्रहण की मूल भावना पर भी सवाल खड़े करेगी।
जांच के आदेश और चुप्पी
पूर्व में इस मामले को लेकर जांच के आदेश भी दिए गए थे, लेकिन अब तक उस जांच का परिणाम सार्वजनिक नहीं हो सका है।
यह चुप्पी कई नए सवाल खड़े करती है—क्या जांच ठंडी पड़ गई, या मामला कहीं दबा दिया गया?
विकास बनाम पारदर्शिता
रायगढ़ जैसे औद्योगिक जिले में भूमि अधिग्रहण केवल आर्थिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि सामाजिक और नैतिक जिम्मेदारी भी है।
यदि आरोप सही साबित होते हैं, तो यह केवल एक वित्तीय घोटाला नहीं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही और पारदर्शिता पर गहरा आघात होगा।
अब जरूरत है कि पूरे मामले की निष्पक्ष और समयबद्ध जांच हो, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि—
क्या यह केवल अनियमितता थी, या फिर सुनियोजित तरीके से रचा गया एक बड़ा “भूमि खेल”?
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