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मानसून ने पकड़ी रफ्तार, अब देरी नहीं: रायगढ़ के किसानों को 30 जुलाई तक धान रोपाई पूरी करने की सख्त सलाह

Journalist Amardeep Chauhan
http://amarkhabar.com

रायगढ़, 7 जुलाई 2026। जून की सुस्त शुरुआत के बाद आखिरकार मानसून ने रफ्तार पकड़ ली है और जुलाई के पहले सप्ताह में हुई अच्छी बारिश ने खेतों में फिर से रौनक लौटा दी है। रायगढ़ जिले सहित पूरे छत्तीसगढ़ के मैदानी इलाकों में अब पर्याप्त नमी और जलभराव की स्थिति बन चुकी है, जिसे कृषि विशेषज्ञ खरीफ सीजन के लिए अनुकूल संकेत मान रहे हैं। ऐसे में कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों को स्पष्ट सलाह दी है कि वे किसी भी प्रकार की देरी से बचें और 30 जुलाई तक धान की रोपाई हर हाल में पूरी कर लें।

इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों के अनुसार, इस वर्ष अल नीनो के प्रभाव के चलते मानसून करीब 10 दिन देर से पहुंचा, जिसके कारण जून महीने में औसत से लगभग 40 प्रतिशत कम वर्षा दर्ज की गई। हालांकि, जुलाई के शुरुआती दिनों में लगातार हुई बारिश ने इस कमी की काफी हद तक भरपाई कर दी है। वर्तमान परिस्थितियों में धान की बुआई और रोपाई के लिए मौसम पूरी तरह अनुकूल है और समय पर किए गए कृषि कार्य सीधे उत्पादन पर सकारात्मक असर डालेंगे।

विशेषज्ञों का कहना है कि जिन किसानों की नर्सरी तैयार हो चुकी है, वे मचाई कर तुरंत रोपाई शुरू करें। वहीं जिनके पास नर्सरी उपलब्ध नहीं है, उनके लिए ‘लेही पद्धति’ एक कारगर विकल्प के रूप में सामने आई है। इस पद्धति के तहत बीजों को 8 से 10 घंटे तक पानी में भिगोकर 24 से 30 घंटे तक अंकुरित किया जाता है और फिर ड्रम सीडर या छिटकवा विधि से बुआई की जाती है। प्रति एकड़ लगभग 40 किलोग्राम बीज की मात्रा उपयुक्त मानी गई है।

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कृषि वैज्ञानिकों ने धान की सीधी बुआई करने वाले किसानों को 15 जुलाई तक यह कार्य पूरा करने की सलाह दी है, जबकि रोपाई एवं बियासी पद्धति अपनाने वाले किसानों को 30 जुलाई अंतिम सीमा के रूप में तय करने को कहा गया है। बदलते मौसम को देखते हुए शीघ्र एवं मध्यम अवधि (125-130 दिन) में पकने वाली किस्मों के चयन पर जोर दिया गया है। इनमें इन्द्रावती, छत्तीसगढ़ बारानी, इंदिरा एरोबिक, एमटीयू-1010, एमटीयू-1153, एमटीयू-1156, एमटीयू-1001, विक्रम टीसीआर, छत्तीसगढ़ धान-1919, छत्तीसगढ़ तेजस्वी और महामाया जैसी किस्में शामिल हैं, जो कम समय में बेहतर उत्पादन देने की क्षमता रखती हैं।

बीज उपचार को लेकर भी वैज्ञानिकों ने किसानों को सचेत किया है। बुआई से पहले बीजों को कार्बेन्डाजिम या अन्य उपयुक्त कवकनाशी से उपचारित करना जरूरी बताया गया है, ताकि शुरुआती अवस्था में रोगों से बचाव हो सके। प्रति किलोग्राम बीज में लगभग 2.5 ग्राम दवा का उपयोग उपयुक्त माना गया है। इसके साथ ही एजोस्पाइरिलम, पीएसबी और केएसबी जैसे जैव उर्वरकों के प्रयोग से फसल को आवश्यक पोषक तत्व उपलब्ध होते हैं और रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम होती है।

धान की खेती में खरपतवार को सबसे बड़ी चुनौती बताते हुए विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यदि समय पर नियंत्रण नहीं किया गया तो उत्पादन में 50 प्रतिशत तक गिरावट आ सकती है। इसलिए बुआई के बाद शुरुआती 40 दिनों तक खेत को खरपतवार मुक्त रखना अनिवार्य है। इसके लिए 20 और 40 दिन बाद हाथ से निंदाई, पैडी वीडर या आवश्यकता अनुसार अनुशंसित खरपतवारनाशी का उपयोग करने की सलाह दी गई है।

उर्वरक प्रबंधन को लेकर भी स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए गए हैं। प्रति एकड़ अधिकतम दो बोरी यूरिया, एक बोरी डीएपी और आधी बोरी पोटाश का उपयोग पर्याप्त माना गया है। डीएपी और पोटाश की पूरी मात्रा बुआई या रोपाई से पहले देने की सलाह दी गई है, जबकि यूरिया की पहली खुराक 30 से 35 दिन और दूसरी खुराक 60 से 70 दिन बाद देना अधिक लाभकारी रहेगा। इसके अलावा हरी खाद और नील हरित काई के उपयोग से मिट्टी की उर्वरा शक्ति बढ़ाने पर भी जोर दिया गया है।

कृषि विभाग ने किसानों से अपील की है कि वे किसी भी तकनीकी समस्या या मार्गदर्शन के लिए नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र, कृषि अनुसंधान केंद्र या कृषि विभाग के अधिकारियों से संपर्क करें। समय पर सही सलाह और वैज्ञानिक तरीकों को अपनाकर ही इस खरीफ सीजन में बेहतर उत्पादन सुनिश्चित किया जा सकता है।

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Amar Chouhan

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