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बरमकेला में रिश्वत का खेल बेनकाब: वेतन के बदले सौदेबाज़ी, ACB ने बीईओ समेत दो को रंगे हाथों दबोचा

Freelance editor Amardeep chauhan @ http://amarkhabar.com

सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिले के बरमकेला विकासखंड में शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर लंबे समय से उठ रहे सवालों को आखिरकार ठोस आधार मिल गया। एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) की सुनियोजित कार्रवाई ने उस सच्चाई को उजागर कर दिया, जिसकी चर्चा दबी जुबान में अक्सर होती थी। विकासखंड शिक्षा अधिकारी नरेंद्र कुमार जांगड़े और संकुल समन्वयक संजय चौहान को 10 हजार रुपये की रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों गिरफ्तार किया जाना केवल एक गिरफ्तारी नहीं, बल्कि उस व्यवस्था पर चोट है, जहाँ अधिकार और सुविधा के बीच सौदेबाज़ी आम हो चली थी।

वेतन बना ‘सौदे’ का माध्यम

पूरा मामला जीकीपाली के शिक्षक निरंजन बरिहा से जुड़ा है, जिनका वेतन कई महीनों से अटका हुआ था। विभागीय प्रक्रिया की आड़ में उनका आर्थिक अधिकार टालते हुए कथित तौर पर रिश्वत की मांग की गई। शुरुआत में बड़ी रकम की बात सामने आई, लेकिन अंततः 10 हजार रुपये पर ‘समझौता’ तय हुआ। यह सिर्फ एक शिक्षक की मजबूरी नहीं, बल्कि उस सिस्टम की तस्वीर है जहाँ जरूरतमंद कर्मचारी को अपने ही हक के लिए कीमत चुकानी पड़ती है।

शिकायत से कार्रवाई तक: एक सुनियोजित ऑपरेशन

हताश होकर निरंजन बरिहा ने ACB से संपर्क किया। शिकायत को गंभीरता से लेते हुए ब्यूरो ने गोपनीय जांच शुरू की, जिसमें आरोप सही पाए गए। इसके बाद एक रणनीति बनाई गई—शिकायतकर्ता को तय रकम के साथ बीईओ कार्यालय भेजा गया। जैसे ही पैसे का लेन-देन हुआ, पहले से घात लगाए ACB की टीम ने तत्काल दबिश देकर दोनों आरोपियों को रंगे हाथों पकड़ लिया।

विभाग में सन्नाटा, सिस्टम पर सवाल

कार्रवाई के बाद पूरे शिक्षा विभाग में खलबली मच गई है। दफ्तरों के गलियारों में अचानक आई यह सख्ती चर्चा का विषय बनी हुई है। जिन आरोपों को अब तक अफवाह मानकर टाल दिया जाता था, वे अब हकीकत बनकर सामने हैं। यह गिरफ्तारी केवल दो व्यक्तियों तक सीमित नहीं, बल्कि उन तमाम शिकायतों की पुष्टि है जो वर्षों से अनसुनी रह जाती थीं।

संदेश साफ है

ACB की इस कार्रवाई ने एक स्पष्ट संकेत दिया है—भ्रष्टाचार अब जोखिम भरा सौदा बनता जा रहा है। सरकारी तंत्र में जवाबदेही की मांग पहले से कहीं ज्यादा मुखर हो चुकी है। हालांकि, यह भी उतना ही सच है कि ऐसी कार्रवाइयाँ तब तक अधूरी हैं, जब तक सिस्टम के भीतर पारदर्शिता और संवेदनशीलता स्थायी रूप से स्थापित न हो जाए।


यह घटनाक्रम न केवल प्रशासनिक सख्ती का उदाहरण है, बल्कि उस उम्मीद का भी संकेत है कि आम कर्मचारी की आवाज अब अनसुनी नहीं रहेगी।

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Amar Chouhan

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