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“धधकते फर्नेस, बुझती जिंदगियां—रायगढ़ में हादसों के साए में क्यों हो रही उद्योग विस्तार की जल्दबाज़ी?”

Freelance editor Amardeep chauhan @ http://amarkhabar.com

रायगढ़, जो कभी औद्योगिक विकास की पहचान माना जाता था, आज एक कड़वे सवाल के साथ खड़ा है—क्या यहां मजदूरों की जान की कीमत सिर्फ उत्पादन के आंकड़ों तक सिमट कर रह गई है?

पिछले कुछ समय से जिले में फर्नेस हादसों की एक खतरनाक श्रृंखला सामने आई है। इन घटनाओं में लगातार मजदूर अपनी जान गंवा रहे हैं या गंभीर रूप से घायल हो रहे हैं। हर हादसे के बाद कुछ दिन की हलचल होती है, लेकिन फिर सब कुछ पहले जैसा हो जाता है—फाइलें बंद, जिम्मेदार मौन, और व्यवस्था अपनी रफ्तार में बेपरवाह।

ऐसे ही माहौल में 21 अप्रैल को शांभवी इस्पात प्राइवेट लिमिटेड के विस्तार को लेकर जनसुनवाई की तैयारियां जारी हैं। सवाल उठता है—जब मौजूदा इकाइयों में सुरक्षा की गारंटी नहीं है, तो नए विस्तार की अनुमति किस आधार पर दी जा रही है?

इस पूरे घटनाक्रम में Chhattisgarh Environment Conservation Board की भूमिका भी कटघरे में है। स्थानीय लोगों और श्रमिक संगठनों का आरोप है कि बोर्ड की कार्यप्रणाली में संवेदनशीलता की कमी साफ दिखाई दे रही है। पर्यावरण और श्रमिक सुरक्षा जैसे गंभीर मुद्दों को दरकिनार कर उद्योगों को प्राथमिकता दी जा रही है।

जिला पर्यावरण अधिकारी पर भी मनमानी के आरोप लग रहे हैं। कहा जा रहा है कि जमीनी हकीकत को नजरअंदाज कर कागजी प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जा रहा है। यह वही समय है जब जरूरत थी—हर हादसे की गहन जांच की, सुरक्षा मानकों की समीक्षा की, और दोषियों पर सख्त कार्रवाई की।

लेकिन हो रहा है इसका उल्टा—जांच अधूरी, जवाबदेही शून्य और विस्तार की प्रक्रिया तेज।

स्थानीय लोगों का गुस्सा अब खुलकर सामने आने लगा है। उनका साफ कहना है कि जब तक—

फर्नेस हादसों की निष्पक्ष जांच नहीं होती,

दोषी अधिकारियों और उद्योग प्रबंधन पर कार्रवाई नहीं होती,

और श्रमिकों की सुरक्षा के ठोस उपाय लागू नहीं होते,


तब तक किसी भी औद्योगिक विस्तार की बात करना न केवल अनुचित है, बल्कि अमानवीय भी है।

यह सिर्फ एक जिले की समस्या नहीं, बल्कि उस सोच का प्रतिबिंब है जहां विकास के नाम पर इंसानी जिंदगी को पीछे छोड़ दिया जाता है।

अंत में एक सीधा सवाल

क्या रायगढ़ में विकास का मतलब सिर्फ चिमनियों से उठता धुआं है, या फिर उन मजदूरों की भी कोई कीमत है जो इन चिमनियों को जिंदा रखते हैं?

अब वक्त आ गया है कि प्रशासन तय करे—
वह उद्योगों के साथ खड़ा है या उन हाथों के साथ, जो हर दिन अपनी जान जोखिम में डालकर इन उद्योगों को चलाते हैं।

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Amar Chouhan

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