तमनार कोल ब्लॉक पर सवालों का साया: पीएमओ तक पहुंची शिकायत, वन–राजस्व की संयुक्त जांच से बढ़ी हलचल

Freelance editor Amardeep chauhan @ http://amarkhabar.com
रायगढ़, 29 मई 2026।
तमनार क्षेत्र के गारे-पेलमा सेक्टर-2 कोल ब्लॉक को लेकर एक बार फिर विवाद गहरा गया है। महाराष्ट्र स्टेट पावर जेनरेशन कंपनी (महाजेंको) को आवंटित इस परियोजना से जुड़ी भूमि प्रक्रियाओं पर गंभीर सवाल उठे हैं। मामला अब प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) तक पहुंच चुका है, जिसके बाद स्थानीय प्रशासन, वन विभाग और राजस्व अमले की सक्रियता अचानक बढ़ गई है।
सूत्रों के अनुसार, शिकायत में क्षतिपूर्ति वृक्षारोपण (Compensatory Afforestation) के लिए चिन्हित भूमि में अनियमितताओं के आरोप लगाए गए हैं। इसी के मद्देनज़र रायगढ़ जिला प्रशासन और वन मंडल को जांच के निर्देश जारी किए गए हैं। वन एवं राजस्व विभाग की संयुक्त टीम तथ्यों का परीक्षण कर रही है और जल्द ही अपनी रिपोर्ट शासन को सौंपेगी।
यह कोल ब्लॉक करीब 2600 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला है, जिसके अंतर्गत लिबरा, डोलेसरा, टिहली रामपुर, पाता, ढोलनारा, मुड़ागांव, चितवाही, झिंकाबहाल, रोडोपली, सारसमाल, कुंजेमुरा, भालूमुड़ा, गारे और सराईटोला सहित कुल 14 गांव प्रभावित हो रहे हैं। इतने बड़े भू-भाग के अधिग्रहण और उससे जुड़े मुआवजे, पुनर्वास और पर्यावरणीय संतुलन जैसे मुद्दे पहले से ही संवेदनशील रहे हैं।
गौरतलब है कि इस परियोजना को पूर्व में मिली पर्यावरणीय स्वीकृति को राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने निरस्त कर दिया था। इसके बाद मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुंचा, जहां से राहत मिलने के बाद केंद्र सरकार के वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने 16 अगस्त 2024 को दोबारा पर्यावरणीय मंजूरी प्रदान की। इसके एवज में नटवरपुर क्षेत्र में वन विभाग को क्षतिपूर्ति वृक्षारोपण हेतु भूमि आवंटित की गई है, जिसकी अधिसूचना भी जारी हो चुकी है और जल्द रोपण कार्य शुरू होने की तैयारी है।
हालांकि, अब उठे नए सवाल इस पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर प्रश्नचिह्न लगा रहे हैं। शिकायत में यह भी आरोप है कि कंपनी को ऐसी भूमि हस्तांतरित की गई जो पहले से ही वन भूमि की श्रेणी में आती थी। यदि यह तथ्य सही पाया जाता है, तो यह नियमों के गंभीर उल्लंघन की श्रेणी में आएगा।
पुराने पैटर्न की पुनरावृत्ति?
स्थानीय स्तर पर चर्चा है कि यह मामला बजरमुड़ा और एनटीपीसी से जुड़े पूर्व विवादों की तर्ज पर ही आगे बढ़ा है। आरोप है कि प्रतिबंध के बावजूद प्रभावित गांवों में जमीनों की खरीद-फरोख्त छोटे-छोटे हिस्सों में कराई गई। एक ही खसरा नंबर को विभाजित कर कई रजिस्ट्री कराई गईं और बाद में उन पर निर्माण कर मुआवजा राशि बढ़ाने की कोशिश की गई।
प्रशासन ने 26 फरवरी 2021 को इन गांवों में क्रय-विक्रय और नामांतरण पर रोक लगाई थी, जबकि 5 अगस्त 2021 को डायवर्सन पर भी प्रतिबंध लागू किया गया था। इसके बावजूद कथित रूप से बाहरी निवेशकों और स्थानीय दलालों की मिलीभगत से जमीन का खेल जारी रहा। नागपुर, बेंगलुरु, रायपुर, दुर्ग और कोरबा जैसे शहरों के खरीदारों की संलिप्तता भी सामने आ रही है।
हालांकि अब प्रशासन स्पष्ट कर चुका है कि मुआवजा हेक्टेयर के आधार पर ही दिया जाएगा, जिससे छोटे-छोटे टुकड़ों में की गई खरीद-फरोख्त का लाभ सीमित हो जाएगा।
जांच पर टिकी नजरें
वन मंडलाधिकारी (DFO) अरविंद पीएम ने पुष्टि की है कि शासन स्तर से जांच के आदेश प्राप्त हुए हैं और विभागीय टीमें तथ्य संकलन में जुटी हैं। उन्होंने कहा कि “वन एवं राजस्व विभाग संयुक्त रूप से जांच कर रहे हैं और शीघ्र ही रिपोर्ट प्रस्तुत की जाएगी।”
इस पूरे घटनाक्रम ने न केवल प्रशासनिक हलकों में हलचल बढ़ाई है, बल्कि क्षेत्र के ग्रामीणों और पर्यावरणीय सरोकार रखने वाले समूहों की चिंता भी गहरा दी है। अब सभी की निगाहें जांच रिपोर्ट पर टिकी हैं—जो तय करेगी कि यह महज प्रक्रियागत चूक है या सुनियोजित गड़बड़ी।
तमनार का यह मामला एक बार फिर यह सवाल खड़ा करता है कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाने की जिम्मेदारी कितनी गंभीरता से निभाई जा रही है। यदि आरोपों में सच्चाई पाई जाती है, तो यह केवल एक परियोजना का विवाद नहीं रहेगा, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही की एक बड़ी परीक्षा बन जाएगा।
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