जनदबाव के आगे झुका तंत्र: गढ़उमरिया में प्रस्तावित स्टील प्लांट की जनसुनवाई फिलहाल टली

Journalist Amardeep chauhan
http://amarkhabar.com
रायगढ़, 30 जून 2026।
शहर से सटे गढ़उमरिया क्षेत्र में प्रस्तावित औद्योगिक विस्तार को लेकर उठे जनविरोध ने आखिरकार असर दिखाया है। मैसर्स रूंगटा संस प्राइवेट लिमिटेड के स्टील प्लांट विस्तार हेतु 2 जुलाई को प्रस्तावित पर्यावरणीय जनसुनवाई को प्रशासन ने फिलहाल स्थगित कर दिया है। छत्तीसगढ़ पर्यावरण संरक्षण मंडल द्वारा जारी आदेश में बताया गया है कि जिला प्रशासन के अनुरोध पर अपरिहार्य कारणों से यह निर्णय लिया गया है।
दरअसल, कंपनी अपने मौजूदा फेरो अलॉय संयंत्र का बड़े पैमाने पर विस्तार कर एक इंटीग्रेटेड स्टील प्लांट स्थापित करना चाहती है, जिसमें कैप्टिव पावर प्लांट भी शामिल है। प्रस्ताव में उत्पादन क्षमता और संयंत्र के दायरे को कई गुना बढ़ाने की योजना है। इसके तहत फेरो अलॉय उत्पादन को 30 हजार टन से बढ़ाकर 42,900 टन प्रतिवर्ष करने के अलावा डीआरआई, एसएमएस, रोलिंग मिल, सिंटर प्लांट, पिग आयरन यूनिट सहित कई नई औद्योगिक इकाइयों को स्थापित करने का प्रस्ताव रखा गया है। साथ ही परियोजना क्षेत्र का विस्तार भी प्रस्तावित है।
हालांकि, इस प्रस्ताव ने शुरुआत से ही स्थानीय स्तर पर चिंता और असंतोष को जन्म दिया। गढ़उमरिया और आसपास के रहवासी क्षेत्रों में पहले से मौजूद औद्योगिक गतिविधियों के चलते वायु प्रदूषण, धूल और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं को लेकर लोग पहले ही परेशान हैं। ऐसे में एक और बड़े संयंत्र के विस्तार की योजना ने नागरिकों, पर्यावरण कार्यकर्ताओं और सामाजिक संगठनों को विरोध के लिए एकजुट कर दिया।
विभिन्न संगठनों ने प्रशासन और पर्यावरण विभाग के समक्ष लिखित आपत्तियां दर्ज कराते हुए मांग की थी कि परियोजना के पर्यावरणीय प्रभावों का व्यापक और पारदर्शी मूल्यांकन किए बिना जनसुनवाई की प्रक्रिया आगे न बढ़ाई जाए। उनका तर्क था कि यदि इस तरह की परियोजनाओं को बिना ठोस आकलन के अनुमति दी जाती है, तो इसका सीधा असर शहर के पर्यावरण और लोगों के स्वास्थ्य पर पड़ेगा।
लगातार बढ़ते विरोध और संभावित कानून-व्यवस्था की स्थिति को देखते हुए जिला प्रशासन ने पर्यावरण संरक्षण मंडल से जनसुनवाई स्थगित करने का अनुरोध किया। इसके बाद मंडल ने 2 जुलाई को प्रस्तावित जनसुनवाई को अगले आदेश तक टालने का निर्णय लिया।
इस घटनाक्रम को स्थानीय नागरिकों और सामाजिक संगठनों ने अपनी एक महत्वपूर्ण सफलता के रूप में देखा है। उनका कहना है कि यह निर्णय न केवल जनभावनाओं का सम्मान है, बल्कि पर्यावरणीय सरोकारों को प्राथमिकता देने की दिशा में एक सकारात्मक संकेत भी है।
फिलहाल, यह स्पष्ट नहीं है कि जनसुनवाई की नई तिथि कब तय की जाएगी, लेकिन इतना तय है कि यह मुद्दा आने वाले दिनों में प्रशासन, उद्योग और आम जनता के बीच संतुलन की एक बड़ी परीक्षा बना रहेगा। पर्यावरणीय मंजूरी की प्रक्रिया में पारदर्शिता और जनभागीदारी को लेकर भी अब सवाल और तीखे हो गए हैं।
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