“ताला बंद पंचायतें, जर्जर भवन और नए निर्माण का खेल: तुरंगा ग्राम पंचायत में सरकारी धन के इस्तेमाल पर गंभीर सवाल”

Freelance editor Amardeep chauhan @ http://amarkhabar.com
रायगढ़ जिले के जनपद पंचायत पुसौर अंतर्गत ग्राम पंचायत तुरंगा का मामला महज़ एक भवन का नहीं, बल्कि पंचायत व्यवस्था की कार्यशैली और सरकारी धन के प्रबंधन पर बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। गांव के पुराने ग्राम पंचायत भवन पर वर्षों से ताला लटका है। नतीजा—भवन जर्जर होता जा रहा है, और इसी जर्जरता को आधार बनाकर नए भवन निर्माण की ज़मीन तैयार कर दी गई।
ग्राम पंचायत भवन लोकतांत्रिक व्यवस्था की सबसे निचली, लेकिन सबसे अहम इकाई होता है। यहीं ग्रामसभा होती है, योजनाओं पर चर्चा होती है और गांव के फैसले लिए जाते हैं। लेकिन तुरंगा में यह भवन वर्षों से अपनी मूल भूमिका से वंचित है।
RTI में “रिकॉर्ड नहीं” का जवाब, सिस्टम पर सवाल
दिनांक 18 अक्टूबर 2024 को पुराने ग्राम पंचायत भवन को लेकर जन सूचना अधिकारी से जानकारी मांगी गई थी—
भवन का निर्माण कब हुआ?
निर्माण पर कितनी राशि स्वीकृत और खर्च हुई?
गारंटी अवधि कितनी थी?
रख-रखाव, मरम्मत, लिपाई-पुताई पर कितना खर्च हुआ?
हैरानी की बात यह रही कि ग्राम पंचायत सचिव द्वारा स्पष्ट जवाब दिया गया कि ग्राम पंचायत में इन बिंदुओं से संबंधित कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है।
यह जवाब अपने आप में गंभीर है। सवाल उठता है कि सार्वजनिक धन से बने भवनों का कोई रिकॉर्ड पंचायत के पास कैसे नहीं है?
20 साल से कम पुराना भवन, फिर नया निर्माण क्यों?
स्थानीय जानकारी के अनुसार पुराना ग्राम पंचायत भवन 20 वर्ष से अधिक पुराना नहीं है। इसके बावजूद वर्ष 2023, 2024 और 2025 में नए ग्राम पंचायत भवन का निर्माण कराया गया।
यदि पुराने भवन का नियमित उपयोग, समय-समय पर मरम्मत और रख-रखाव किया गया होता, तो क्या नए भवन की ज़रूरत पड़ती?
दस साल तक ताला, फिर जर्जर घोषित करने की तैयारी
ग्रामीणों का कहना है कि पुराने पंचायत भवन पर करीब 10 वर्षों तक ताला लगा रहा, जो आज भी बंद है। स्वाभाविक है कि बिना उपयोग के कोई भी भवन जर्जर हो जाएगा। अब यदि निष्पक्ष जांच कराई जाए, तो यह साफ हो सकता है कि भवन वास्तव में कितना जर्जर है और उसे जानबूझकर अनुपयोगी बनाकर नए निर्माण का रास्ता तो नहीं बनाया गया।
ग्रामसभा सिर्फ कागज़ों में?
बताया जाता है कि वर्ष 2015 से 2024 के बीच ग्राम पंचायत भवन में नियमित ग्रामसभा या पंचायत कार्य होते हुए नजर नहीं आए। अगर कहीं ग्रामसभा हुई भी होगी, तो वह सिर्फ औपचारिकता तक सीमित रही—लिपा-पोती और कागज़ी खानापूर्ति के साथ।
मूल सवाल यही है
क्या ग्राम पंचायत भवनों को जानबूझकर बंद रखा जाता है ताकि वे जर्जर घोषित हो सकें?
क्या इसके बाद नए भवन निर्माण की मांग कर सरकारी धन का दुरुपयोग किया जाता है?
और सबसे अहम—इन सबका जवाबदेह कौन है?
तुरंगा का मामला अकेला नहीं लगता, बल्कि यह पंचायत स्तर पर चल रही एक खामोश लेकिन महंगी प्रवृत्ति की ओर इशारा करता है। ज़रूरत है कि जिला प्रशासन और पंचायत विभाग इस पूरे प्रकरण की स्वतंत्र और गहन जांच कराए, ताकि सच सामने आए और ग्राम पंचायतें फिर से अपने असली उद्देश्य—जनसेवा—की ओर लौट सकें।
News associate PN Pradhan